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भारतीय विदेशनीति के निर्धारक तत्व

                  विदेशनीति के निर्धारक तत्व


विदेश नीति राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति के लिए अनुसरण की जाने वाली नीतियां हैं। किसी देश की विदेशनीति ही विश्व के अन्य देशों के साथ उसके सम्बन्ध को निर्धारित करती है। यही कारण है कि प्रत्येक देश ऐसी विदेशनीति को निर्मित करने का प्रयास करता है,जिसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में वह अपने राष्ट्रीय हितों को संरक्षित कर सके। किसी देश की विदेशनीति को आकार देने में अनेक कारको की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस सम्बंध में विदेशनीति के निर्धारक के रूप में घरेलू या आंतरिक कारकों के साथ-साथ बाह्य कारकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।


     विदेशनीति के घरेलू या आंतरिक निर्धारक


1.भौगोलिक कारक


 नेपोलियन के अनुसार भूगोल किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति को निर्धारित करने में केंद्रीय भूमिका निभाता है। इस संदर्भ में अनेक भू राजनीतिक चिंतको द्वारा भी भूगोल की इस भूमिका को रेखांकित किया गया है। हेलफोर्ड जॉन मैकिंडर के अनुसार विश्व के हृदय स्थल पर जिसका नियंत्रण होगा, वही विश्व को नियंत्रित करेगा अर्थात जिसके पास भूमि आधारित सैन्य शक्ति प्रभावी होगी वहीं वैश्विक शक्ति होगा। दूसरी ओर स्पाइकमैन और अल्फ्रेड महान जैसे विचारको के अनुसार वैश्विक शक्ति बनने के लिए सामुद्रिक शक्ति का होना आवश्यक है। हालांकि वर्तमान में भू शक्ति एवं समुद्री शक्ति दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है,जैसे चीन द्वारा प्रारंभ बेल्ट और रोड पहल का उद्देश्य जहां एक तरफ भू शक्ति के रूप में मध्य एशिया से होते हुए यूरोप तक अपने प्रभाव का विस्तार करना है तो वहीं दूसरी ओर सामुद्रिक शक्ति के रूप में दक्षिणी चीन सागर और हिंद महासागर होते हुए भूमध्य सागर तक अपने प्रभाव का विस्तार करना है।
भारतीय विदेश नीति को निर्धारित करने में भी भौगोलिक कारक की महत्वपूर्ण भूमिका है। हिंद महासागर में भारत की केंद्रीय उपस्थिति के कारण ही वर्तमान में उसे हिंद प्रशांत क्षेत्र के नेतृत्वकर्ता के रूप में देखा जा रहा है। भारत का भूगोल उसके पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को भी निर्धारित करता है जैसे भारतीय विदेश नीति में नेपाल और भूटान की बफर स्टेट के रूप में भूमिका। इसी प्रकार पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद की स्थिति भी बनी हुई है।

2.आर्थिक कारक 


किसी भी राष्ट्र के लिए आर्थिक संप्रभुता सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि आर्थिक आवश्यकताएं ही अंतरराष्ट्रीय संबंधों का निर्धारण करती हैं। उल्लेखनीय की प्रारंभ में भारत को अमेरिका और सोवियत संघ दोनों की आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी। ऐसे में भारत में मिश्रित आर्थिक प्रणाली को स्वीकार किया,जिससे दोनों ही देश से आर्थिक सहायता मिल सके। 1990 के बाद भारत द्वारा जब उदारीकरण,निजीकरण और वैश्वीकरण स्वीकार किया गया तो अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भारत के संबंध बेहतर होने लगे। इसी प्रकार वर्तमान में भारत और चीन के मध्य प्रतिस्पर्धा देखी जा रही है,जहां चीन अपने डीप पॉकेट के बल पर भारत के पड़ोसी देशों पर आर्थिक नियंत्रण स्थापित कर रहा है। ऐसे में भारत द्वारा भी आर्थिक सहायता कूटनीति के माध्यम से पड़ोसी देशों के लिए अपने बजट में वृद्धि की गई है। दूसरी ओर भारत वर्तमान भू अर्थ प्रधान विश्व में आर्थिक शक्ति के माध्यम से ही वैश्विक शक्ति बन सकता है। इसलिए एक तरफ मेक इन इंडिया जैसे पहल प्रारंभ किए गए तो दूसरी ओर आत्मनिर्भर भारत पर बल दिया जा रहा है।


3.जनांकिकी एवं सामाजिक संरचना 


भारत की विशाल जनसंख्या के कारण यहां की आवश्यकताएं अत्यधिक जटिल थी,क्योंकि यहां गरीबी भुखमरी, बेरोजगारी जैसी समस्याएं विद्यमान थी। इसलिए प्रारंभ में सैन्य व्यय के स्थान पर विकासात्मक गतिविधियों पर अधिक बल दिया गया। दूसरी ओर वर्तमान में भारत में न केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार बन चुका है बल्कि जनांकिकीय लाभांश के दौर से गुजर रहा है,इसलिए विश्व के अन्य देश भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

 भारत की सामाजिक संरचना अत्यधिक विविधता पूर्ण है, इसलिए विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समूह विश्व के अन्य देशों से संबंध निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। 


4.इतिहास और संस्कृति 


भारतीय विदेश नीति के निर्धारण में इतिहास और संस्कृति की मुख्य भूमिका है भारत कभी भी आक्रामक या साम्राज्यवादी देश नहीं रहा बल्कि शांतिपूर्ण सह अस्तित्व पर आधारित रहा है। भारतीय संस्कृति शांति और सहयोग पर ही बोल देती रही है,जो बुद्ध, गांधी जैसे व्यक्तित्व पर आधारित है। दूसरी ओर कौटिल्य के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत भारतीय विदेश नीति को अधिक यथार्थपरक बनाते हैं। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ही साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद रंगभेद का विरोध किया गया और गुटनिरपेक्षता का विचार भी निर्मित हुआ,इसलिए स्वतंत्रता के बाद भारत द्वारा शांतिपूर्ण सह अस्तित्व पर आधारित गुटनिरपेक्ष और पंचशील जैसी नीतियों को स्वीकार किया गया।


5.राजनीतिक संरचना


 भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है जिसके कारण लोकतांत्रिक देश के साथ उसके बेहतर संबंध है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में भी भारतीय विदेश नीति के आधार के रूप में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर विशेष बल दिया गया है। इसे अन्य देशों के साथ महत्वपूर्ण संबंध तथा विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर बल दिया गया है।


6.संघीय व्यवस्था


भारतीय संविधान में संघीय शासन के तहत संघ और राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन किया गया है, जहां विदेश नीति को संघ सूची का विषय बनाया गया है। इसलिए विदेश नीति के निर्धारण और संचालन में संघ सरकार की भूमिका केंद्रीय होती है, लेकिन हाल के वर्षों में विदेश नीति के निर्धारण में राज्यों की भूमिका भी बढ़ती गई है। विदेश नीति पर संघीय शासन के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव हो सकते हैं।

 सकारात्मक प्रभाव 

  •राज्यों की भूमिका भारत के विकास एजेंट के रूप में है। इसलिए वर्तमान में विदेश नीति निर्माण की प्रक्रिया भी विकेंद्रित हुई है। इससे विदेश नीति की प्रक्रिया अधिक लोकतांत्रिक और भागीदारी पूर्ण हो जाती है। जिससे विदेश नीति को सामाजिक वैधता और जनमत का समर्थन मिलता है।

 • विभिन्न राज्यों की भौगोलिक अवस्थिति और सामाजिक संरचना उन्हें विभिन्न देशों के साथ संबंधों को बेहतर करने का अवसर देती है,

 •वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में राज्यों के माध्यम से ही वैश्विक अवसरों का दहन किया जा सकता है,क्योंकि राज्य निवेश स्थल, पर्यटन और व्यापारिक केंद्र के रूप में विश्व के अन्य देशों को आकर्षित कर सकते हैं। विशेष कर विदेशी निवेश को आकर्षित करने हेतु राज्यों को ही प्रतिस्पर्धी आर्थिक परिवेश का निर्माण करना होता है।

• राज्यों की विदेश नीति में भूमिका बढ़ाने से राज्यों के स्तर पर गतिशीलता और सक्रियता में वृद्धि होती है,जिससे कूटनीति के विभिन्न विकल्पों का विकास होता है,जैसे असम सरकार द्वारा पूर्वी एशियाई देशों से संबंध बेहतर करने के लिए एक्ट ईस्ट विभाग का गठन किया गया है। इसे वर्तमान में पैरा डिप्लोमेसी के रूप में मान्यता प्राप्त है।

नकारात्मक प्रभाव

 •राज्यों की विदेशनीति में बढ़ती भूमिका से इनकी सौदेबाजी की संभावना भी बढ़ती है। राज्यों का पक्ष प्रायः भावनात्मक होता है, जबकि विदेश नीति संवेदनशील विषय है जो सामरिक हितों के यथार्थपरक पक्ष पर आधारित होती है। जैसे तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों के दबाव के कारण श्रीलंका के साथ संबंधों में तनाव उत्पन्न हुआ। इसी प्रकार पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के कारण बांग्लादेश के साथ संबंध प्रभावित हुए 

• विदेश नीति राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्मित होती है,जबकि राज्यों के द्वारा क्षेत्रीय हितों को प्राथमिकता दी जाती है।

• विदेश नीति विशेषज्ञता का कार्य है, जबकि राज्यों को इसका अनुभव नहीं होता है। 

 •विदेश नीति के विकेंद्रीकरण से अस्पष्ठता और असमंजस की संभावना बढ़ सकती है, क्योंकि राज्यों के संघ सरकार से भिन्न दृष्टिकोण होने पर विभिन्न देशों के साथ संबंध प्रभावित हो सकते हैं।


मीडिया निर्धारक तत्व के रूप में 


विदेश नीति के निर्धारण में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है ।वस्तुत मीडिया की भूमिका एजेंडा निर्धारित करने में होती है। यह व्यापक वैश्विक हितों को एजेंडा बन सकती है या संपूर्ण राष्ट्रीय हितों को, यह शांति के लिए परिवेश भी निर्मित कर सकती है तो युद्ध के लिए आक्रामक जनमत का निर्माण भी कर सकती है।मीडिया देश की अंतरराष्ट्रीय छवि या प्रतिष्ठा को निर्मित करती है, जैसे सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान भारत की हार्ड पॉवर के रूप में छवि को मजबूत किया गया। दूसरी और मीडिया देश के अंतरराष्ट्रीय छवि को धूमिल करने में भी भूमिका निभा सकती है। मीडिया द्विपक्षी संबंधों को भी प्रभावित कर सकती है, जैसे हाल के वर्षों में भारतीय मीडिया की कुछ आपत्तिजनक कवरेज के कारण बांग्लादेश और नेपाल के साथ संबंध प्रभावित हुए। वर्तमान वैश्विक सूचना समाज में किसी घटना का स्पिलओवर इफेक्ट हो सकता है जिससे स्थानीय मुद्दे वैश्विक मुद्दे बन जाते हैं। इससे विदेश नीति के स्तर पर पारदर्शिता आती है और सरकारों पर दबाव उत्पन्न होता है।


तकनीक निर्धारक के रूप में


वर्तमान भू अर्थ प्रधान विश्व में सैनिक शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण सिविलियन पावर हो गया है। सिविलियन पावर को निर्धारित करने में तकनीक की केंद्रीय भूमिका होती है। तकनीक के माध्यम से राष्ट्रों के मध्य सहयोग के नए क्षेत्र का भी विकास हो रहा है, जैसे चौथी औद्योगिक क्रांति या ब्लू इकोनामी के क्षेत्र में। इसे विश्व में तकनीकी अंतरनिर्भरता बढ़ रही है। भारत भी अपनी तकनीकी विशेषज्ञता के कारण न केवल विश्व के अन्य देशों को आकर्षित करता है बल्कि उनके विकास भागीदार और सुरक्षा प्रदान के रूप में भी अपनी भूमिका निभाता है, जैसे दक्षिण एशियाई देशों के लिए प्रक्षेपित दक्षिण एशिया उपग्रह। तकनीक वर्तमान में कूटनीतिक संवाद का भी मुख्य आधार है, इसलिए वर्तमान में डिजिटल डिप्लोमेसी पर बल दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त तकनीक विभिन्न देशों के मध्य एक साझा प्लेटफार्म भी उपलब्ध करा सकता है। जिससे वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी समाधान हो सकता है, जैसे कोविड आपदा के दौरान वर्चुअल कॉन्फ्रेंस द्वारा दक्षेस देशों की बैठक का आयोजन।


हालांकि तकनीक विदेश नीति के सम्मुख चुनौती भी प्रस्तुत करता है,क्योंकि तकनीक वैश्विक शक्ति को निर्धारित करती है। लेकिन वर्तमान विश्व में तकनीकी रंगभेद की स्थिति देखी जाती है अर्थात विश्व तकनीकी संपन्न एवं विपन्न देश में में विभाजित है। दूसरी ओर तकनीक राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु चुनौती भी बनती जा रही है,जैसे साइबर हमले, जैविक हथियार आदि रूपो में। वर्तमान में तकनीकी अंतर निर्भरता में वृद्धि तो हुई है , पर तकनीकी रूप से कमजोर देश की डिजिटल संप्रभुता खत्म भी हो रही है।



         विदेशनीति के बाह्य निर्धारक



1.अंतरराष्ट्रीय परिवेश


विदेश नीति के निर्धारण में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था या परिवेश महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यथार्थवादी चिंतन के अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना अराजकता पूर्ण है,इसलिए राष्ट्र राज्य शक्ति के लिए परस्पर संघर्षरत होते हैं। 


इस पृष्ठभूमि में भारतीय विदेश नीति पर शीत युद्ध की शक्ति राजनीति का प्रभाव देखा गया, जैसे शीत युद्ध के दौर में गुटीय राजनीति के कारण भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता को संरक्षित करने का प्रश्न महत्वपूर्ण था। यही कारण था कि भारतीय विदेश नीति गुटनिरपेक्षता पर आधारित थी, जिसके तहत भारत ना तो अमेरिकी गुट का सदस्य बना और ना ही सोवियत संघ के गुट का,बल्कि भारत द्वारा तीसरी दुनिया के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वयं को स्थापित किया गया। 

शीत युद्ध के दौर में अमेरिका द्वारा हिंद महासागर के सैन्यीकरण का प्रयास किया गया। इस क्रम में अमेरिका द्वारा डियागो गार्सिया को सैन्यकेंद्र के रूप में निर्मित किया गया, जिससे इस क्षेत्र के नवस्वतंत्र देश की संप्रभुता और सुरक्षा के समझ खतरे उत्पन्न हुए। इसके परिणाम स्वरुप संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1971 में इन देशों के पहल पर इस क्षेत्र को हिंद महासागर शांति क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया। लेकिन इसके बावजूद इस क्षेत्र में महाशक्तियां हमेशा सक्रिय रही है। इसलिए भारत को भी हिंद प्रशांत क्षेत्र में अपनी नौसैन्य क्षमता के विकास पर ध्यान देना पड़ा। इसी प्रकार दक्षिण एशिया में भारत के लिए तब गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ जब पाकिस्तान, अमेरिका और चीन का त्रिगुट निर्मित हुआ। इस दौर में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष गंभीर प्रश्न उपस्थित हुए।इसी पृष्ठभूमि में 1971 में भारत सोवियत मित्र साथ संधि संपन्न हुई।


इसी प्रकार उदारवादी मान्यता के अनुसार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा निर्मित अंतरराष्ट्रीय कानून के माध्यम से विश्व में शांतिपूर्ण परिवेश निर्मित किया जा सकता है। भारत शीतयुद्ध की गुटीय राजनीति के दौर में शक्ति राजनीति में उलझना नहीं चाहता था। यही कारण है कि भारत द्वारा सदैव संयुक्त राष्ट्र संघ के आदर्श में पूर्ण आस्था व्यक्त की गई। नवस्वतंत्र देश के रूप में भारत निशस्त्रीकरण की मांग संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर करता रहा है।


वहीं शीतयुद्धोंत्तर विश्व में जब अमेरिका के नेतृत्व में एकध्रुवीय विश्व की स्थापना हुई,तो भारत द्वारा एक तरफ अमेरिका के साथ संबंधों को सामान्य करने के प्रयास हुए तो दूसरी ओर नाभकीय हथियार अर्जित कर राष्ट्रीय सुरक्षा को संरक्षित करने का प्रयास किया गया। इसी प्रकार वर्तमान विश्व में जिस प्रकार चीन का एशिया प्रशांत क्षेत्र में आक्रामक उभरा हुआ है, इससे इस क्षेत्र के अनेक देश चीन से भयभीत हैं और चीन की आधिपत्यवादी नीतियों के विरुद्ध भारत को एक विकल्प के रूप में देखते हैं। यही कारण है वर्तमान में अमेरिका सहित विश्व के अनेक देश भारत को हिंद प्रशांत क्षेत्र के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वीकार रहे हैं। 2014 के बाद भारतीय विदेश नीति भी हिन्द प्रशांत क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका को स्थापित करने का प्रयास कर रही है।


2.अंतरराष्ट्रीय शक्ति संरचना


अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति राजनीति शाश्वत यथार्थ के रूप में रहा है। वैश्विक महा शक्तियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में वर्चस्व स्थापित करने की प्रयास होते रहे हैं, जैसे शीत युद्ध के दौर में पश्चिमी देशों और सोवियत संघ द्वारा विकासशील देशों में अपने वर्चस्व को स्थापित करने का प्रयास किया गया,जिससे तीसरी दुनिया के देशों की राष्ट्रीय सम्प्रभुता पर गम्भीर संकट उत्तपन्न हुआ। यही कारण है कि इस दौर में भारत एक संतुलनकारी देश के रूप में अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता को संरक्षित करने का प्रयास करता रहा। वही समकालीन विश्व मे भारत सहित अनेक मध्यमकारी शक्तियों का भी उभार देखा जा रहा है,जो वैश्विक शक्ति राजनीति में अपना स्थान निर्मित करने का प्रयास कर रहे हैं। 


3.वैश्वीक और क्षेत्रीय समूह


वर्तमान भू अर्थ प्रधान विश्व में राष्ट्र राज्यों के मध्य अंतरनिर्भर संबंधों का विकास हो रहा है, जहां प्रत्येक राष्ट्र क्षेत्रीय संगठनों के माध्यम से सामूहिक रूप में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है। इस संबंध में भारत द्वारा भी दक्षेस के मंच पर दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय एकीकरण का प्रयास किया गया। वहीं वर्तमान में हिन्द प्रशांत क्षेत्र में भारत बिम्सटेक,हिमतक्षेस,फिपिक जैसे संगठनों के माध्यम से अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है। 

इसी प्रकार पश्चिमी देशों के वैश्विक प्रभाव को चुनौती देने के लिए ब्रिक्स समूह का गठन हुआ, जिसमें भारत भी एक सदस्य के रूप में है। भारत और विकासशील देशों की यह सहभागिता शंघाई सहयोग संगठन के मंच पर भी है।

 वर्तमान में भारत वैश्विक नीति निर्माता के रूप में अपनी वैश्विक भूमिका का विस्तार कर रहा है और इस संदर्भ में महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगठनों का गठन भी कर रहा है,जैसे अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस आदि।


4.वैश्विक जनमत


 किसी भी राष्ट्र की वैश्विक छवि अन्य देशों के साथ उसके संबंधों को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विशेषकर वर्तमान सूचना युग मे प्रत्येक देश अपनी वैश्विक छवि के प्रति अधिक संवेदनशील है। किसी भी देश की वैश्वीक छवि उसे सॉफ्ट पॉवर के रूप में स्थापित करती है। इसलिए प्रत्येक देश सांस्कृतिक कूटनीति,आर्थिक सहायता कूटनीति,मेडिकल कूटनीति आदि माध्यमो से वैश्विक जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहे है।


5.गैर राज्यीय कर्ताओ की भूमिका


वैश्वीकरण के दौर में संप्रभुता की परंपरागत धारणा में बदलाव है, इसलिए वर्तमान में राज्यों के साथ-साथ गैर राज्यीय कर्ताओं की भूमिका में वृद्धि देखी जा रही है। गैर राज्यीय कर्ता विश्व के अनेक देशों में सक्रिय हैं और राज्यों की नीतियों को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। गैर राज्यीय कर्ताओं के कारण पार राष्ट्रीय संबंधों का विकास होता है, जिससे पारस्परिक संबंधों में अधिक विविधता और गहराई आती है, इसलिए कहा भी जाता है कि गैर राज्यीय कर्ता विदेश नीति के एजेंडे को अधिक व्यापक बनाते हैं। उदारवादियों के अनुसार गैर राज्यीय कर्ताओं के कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गुणात्मक बदलाव आए है। इन्होंने शक्ति राजनीति के स्थान पर पारस्परिक सहयोग और विश्वास की भावना को मजबूत किया है। इनके कारण वैश्विक जनमत अधिक नजदीक आ रहा है,जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण के लिए आवश्यक भी है। गैर राज्यीय कर्ता अन्य देशों के साथ कूटनीतिक संपर्क में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे अन्य राज्यों से अनौपचारिक संबंधों का विकास होता है। गैर राज्यीय कर्ता वैश्विक स्तर पर सामूहिक प्रयासों का आधार भी निर्मित करते हैं, विशेष कर व्यापार, मानवाधिकार संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण आदि क्षेत्र में।

हालांकि गैर राज्यीय कर्ता विकसित देशों के निहित स्वार्थ को पूरा करने के माध्यम भी है। इनके द्वारा विकासशील देशों की नीतियों को परिवर्तित करने के लिए दबाव उत्पन्न किया जाता है। इनके द्वारा अन्य देशों की छवि को नकारात्मक और धूमिल करने का भी प्रयास किया जाता है। गैर राज्य कर्ताओं का प्रभावी विनियमन नहीं हो पाता, इसलिए यह गैर जवाबदेह होते हैं और किसी देश में सुरक्षा चुनौतियां भी उत्पन्न कर सकते हैं।


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