गुटनिरपेक्ष आंदोलन
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि
औपनिवेशिक शासन के अंत का शीत युद्ध के दौरान तीसरी दुनिया के देशों के मध्य एकता की आवश्यकता के आधार पर निर्मित हो गया था। यह आंदोलन वैश्विक शांति और सुरक्षा के संरक्षण की मांग पर आधारित है इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध तीसरी दुनिया के देशों द्वारा संचालित राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ही निर्मित हो गई थी, हालांकि इसका आधार 1947 में नई दिल्ली में आयोजित एशिया अफ्रीका देश के सम्मेलन में निर्मित हुआ। वहीं 1955 में आयोजित बांडुंग सम्मेलन में इसके मार्गदर्शक सिद्धांत निर्मित हुए थे। बांडुंग सम्मेलन में 29 एशियाई अफ्रीकी देशों की सहभागिता देखी गई। इस सम्मेलन में 10 सिद्धांतों की घोषणा की गई जो निम्नलिखित है-
• संयुक्त राष्ट्र के चार्टर और उद्देश्यों व सिद्धांतों तथा मानवाधिकार के प्रति सम्मान,
• सभी राष्ट्रों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति सम्मान
• सभी राष्ट्रों तथा नस्लों के मध्य समानता की भावना
• एक दूसरे देश के आंतरिक मामलों में गैर हस्तक्षेप • प्रत्येक देश के आत्मरक्षा के अधिकार का सम्मान • पारस्परिक विवादों का शांतिपूर्ण समाधान • पारस्परिक हित और सहयोग की भावनाओं को बढ़ावा देना
• अंतरराष्ट्रीय दायित्व और न्याय के प्रति सम्मान
• संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ अनुरूपता
• गैर आक्रामकता
हालांकि गुटनिरपेक्ष आंदोलन की औपचारिक शुरुआत 1961 के बेलग्रेड सम्मेलन से हुई। इस सम्मेलन में 25 देश की सहभागिता थी और इसे एक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया ना कि संगठन के रूप में। इस दौरान गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सदस्यता के लिए शर्तें भी निर्धारित की गई, जो निम्नलिखित है-
• सदस्य देश अपने से भिन्न राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था रखने वाले राज्यों के साथ सह अस्तित्व और गुटनिरपेक्षता की भावना पर आधारित स्वतंत्र नीति को स्वीकार करेंगे
• सदस्य देश अन्य देशों में संचालित राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को समर्थन देंगे
• सदस्य देश शक्ति राजनीति के लिए गठित किसी सैन्य गठबंधन का सदस्य नहीं बनेंगे
• यदि सदस्य देशों का किसी महाशक्ति के साथ द्विपक्षीय सैन्य समझौता है तो ऐसा समझौता जानबूझकर किसी शक्ति संघर्ष हेतु नहीं होना चाहिए
• यदि सदस्य देश द्वारा किसी विदेशी शक्ति को सैन्यकेन्द्र की अनुमति दी गई है,तो यह अनुमति शक्ति राजनीति के संदर्भ में नहीं होनी चाहिए
इसलिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन तीसरी दुनिया की सामूहिक आवाज के रूप में प्रारंभ हुई, जिसने शक्ति राजनीति के स्थान पर सहयोग की राजनीति पर बल दिया। प्रोफेसर एम एस राजन के शब्दों में यह आंदोलन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लोकतांत्रिकरण मांग थी। यह आंदोलन अधिपत्यवादी पदसोपानिक विश्व के स्थान पर समानता और सामूहिकता पर आधारित विश्व की धारणा थी।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के विकास के विभिन्न चरण
प्रथम चरण
1960 के दशक में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रथम चरण में निम्नलिखित एजेंडा निर्धारित किया गया-
• साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद और रंगभेद का विरोध
• सार्वभौमिक निशस्त्रीकरण
• संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रभावी बनाना
• शक्ति और गुटीय राजनीति का विरोध करना
इस चरण में 1962 में क्यूबा संकट के दौरान शक्ति राजनीति अपने सर्वोच्च बिंदु पर थी। नाभिकीय युद्ध की परिस्थितियों निर्मित हो रही थी। ऐसे में गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल सदस्य देशों द्वारा क्यूबा संकट का विरोध किया गया। यह गुटनिरपेक्ष आंदोलन की ही सफलता थी कि क्यूबा संकट के बाद शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के मध्य तनाव शैथिल्य की घोषणा की गयी।साथ ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन के कारण ही वैश्विक स्तर पर निशस्त्रीकरण के प्रयास भी प्रारंभ हुए, जैसे 1963 में PTBT और 1968 में नाभिकीय अप्रसार समझौता। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रयासों के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका भी प्रभावी हुयी।
हालांकि इस दौर में अमेरिका और सोवियत संघ दोनों द्वारा गुटनिरपेक्ष आंदोलन की आलोचना की गई। अमेरिका के राज्य सचिव जान फास्टर डल्लास के शब्दों में शीत युद्ध के वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर में गुटनिरपेक्षता की धारणा निरर्थक है। यह अनर्गल और अवसरवादी विचारधारा है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन तो सोवियत ब्लॉक का ही विस्तार मात्र है। वस्तुतः यह निष्क्रियता और तटस्थता की नीति है। दूसरी ओर सोवियत संघ ने इसे पूंजीवादी गुट का विस्तार कहा। आलोचको के अनुसार गुटनिरपेक्ष देशों के प्रयासों के बावजूद शीत युद्ध की शक्ति राजनीति प्रभावी बनी रही,जिसे वियतनाम संकट,तेल संकट आदि रूपों में देखा गया। दूसरी ओर गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थांकरण का प्रयास भी नहीं किया गया, ना तो इसका कोई सचिवालय है और न ही इसकी कार्ययोजना के निर्धारण में कोई स्पष्टता थी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन में नियमित संवाद का भी अभाव देखा गया।
दूसरा चरण
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रथम चरण में राजनीति एजेंडे पर बल दिया गया तो दूसरे चरण में आर्थिक विकास पर बल दिया गया। वस्तुतः एशियाई अफ्रीकी देशों में यह धारणा मजबूत हुई की आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है। इसीलिए गुटनिरपेक्ष देशों ने नवअंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की मांग को प्रस्तावित किया गया,क्योंकि उनके अनुसार विकसित देश नव उपनिवेशवादी नीतियों के माध्यम से विकासशील देशों का आर्थिक शोषण कर रहे हैं। पराश्रितता सिद्धांतकारों का भी यह मानना था की परिधि के देशों से केंद्र की ओर धन का निष्कासन हो रहा है। इसलिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मंच पर निम्नलिखित मांग की गई -
•व्यापार की शर्तों को निष्पक्ष और प्रभावी बनाना
•बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जवाबदेह बनाना
•कच्चे माल की कीमतों का उचित निर्धारण करना
•ब्रिटेनवुडस संस्थानों में सुधार करना
•विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को तकनीकी और वित्तीय हस्तांतरण करना
1970 के दशक में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मंच पर आर्थिक मुद्दे केंद्रीय हो गए जिससे गुटनिरपेक्ष आंदोलन को नई ऊर्जा मिली। इस समय गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थांकरण का प्रयास भी प्रभावी हुआ,जैसे 1973 के अल्जीयर्स सम्मेलन में एक समन्वयकारी ब्यूरो की स्थापना की गई।
हालांकि गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रभावशीलता पर भी प्रश्न उपस्थित हुए, क्योंकि तीसरी दुनिया के देशों के मध्य सुदृढ़ता का अभाव देखा गया। सदस्य देश परस्पर संघर्षरत थे। दूसरी ओर नवअंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मांग को काल्पनिक कहा गया, क्योंकि कच्चे माल की कीमतें विनिर्मित उत्पादों के बराबर नहीं हो सकती थी। यह भी कहा गया कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार में समाजवादी धारणा को लागू करने का प्रयास मात्र है। दूसरी ओर इस चरण में नव शीत युद्ध की भी शुरुआत हुई, जिसे अफगानिस्तान संकट और खाड़ी संकट के रूप में देखा जा सकता है।
तीसरा चरण
1990 के दशक में सोवियत संघ का विघटन हो गया तो तर्क दिया गया कि जब गुटीय राजनीति नहीं तो गुटनिरपेक्षता क्यों। यह भी कहा गया कि अब गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उद्देश्य भी पूरा हो गया है,जैसे साम्राज्यवाद,उपनिवेशवाद और रंगभेद नीति का अंत हो गया था। ऐसे में मिस्र जैसे सदस्य देशों ने ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन को भंग करने का प्रस्ताव रख दिया। अनेक देश स्वयं को गुटनिरपेक्ष आंदोलन से बाहर कर रहे थे, जैसे युगोस्लाविया। इराक और कुवैत के मध्य खाड़ी युद्ध के दौरान गुटनिरपेक्ष देशों में आम समिति का अभाव देखा गया, जबकि इराक और कुवैत दोनों ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्य थे।
समकालीन विश्व में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता पर उठते प्रश्न
वर्तमान भू अर्थ प्रधान विश्व शीत युद्ध के दौर से बाहर निकल चुका है। इसलिए इस अंतनिर्भर विश्व में बहुपक्षीय संबंधों की आवश्यकता है ना कि गुटनिरपेक्षता की। वर्तमान विश्व में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के स्थान पर क्षेत्रीय आर्थिक संगठनों पर अधिक बल दिया जा रहा है, क्योंकि क्षेत्रीय आर्थिक संगठन आर्थिक समृद्धि के नए केंद्र हैं। एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में अवस्थित देश के मध्य साझे और पूरक हित पाए जाते हैं। इसलिए इनके मध्य क्षेत्रीय स्तर पर प्रकार्यात्मक संबंध होते हैं, जबकि गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मंच पर विभिन्न देशों के मध्य सामाजिक आर्थिक भिन्नता एवं राजनीतिक मतभेद देखे जाते हैं।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अस्तित्व शीतयुद्ध की शक्ति राजनीति में प्रासंगिक तो था, लेकिन शीतयुद्धोत्तर विश्व में गुटीय राजनीति का अंत हो गया है, इसलिए गुटनिरपेक्षता की क्या आवश्यकता है? वस्तुतः गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देश ही इसके प्रति अनिश्चित हैं, क्योंकि प्रत्येक देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रहे है। भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन की विगत दो बैठकों में भाग नहीं लिया गया,जो इस आंदोलन में प्रमुख देशों की बढ़ती अरुचि को प्रदर्शित कर रहा है।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के परंपरागत उद्देश्य शीत युद्ध के अंत के साथ ही पूरे हो गए नामीबिया से उपनिवेशवाद और दक्षिण अफ्रीका से रंगभेद की समाप्ति हो गई। ऐसे में इस आंदोलन की अब आवश्यकता नहीं है।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन का कभी संस्थागत विकास भी नहीं हुआ है अर्थात इसका अपना सचिवालय नहीं है स्पष्ट कार्य योजना और उद्देश्य का अभाव है। अनेक सदस्य देश इसके आदर्श का उल्लंघन करते हैं। नियमित बैठकों का अभाव है। इसलिए सी राजामोहन के शब्दों में गुटनिरपेक्ष आंदोलन सदैव ही अक्रियाशील रहा है, यह शीत युद्ध के अंत के पहले ही अप्रासंगिक हो गया था। शीतयुद्ध के अंत ने तो इससे मरणासन्न अवस्था में रख दिया है, क्योंकि सदस्य देश इसे दफनाने के लिए तैयार नहीं है।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता
गुटनिरपेक्ष आंदोलन वर्तमान विश्व में भी प्रासंगिक है,क्योंकि वर्तमान विश्व में भी शक्ति राजनीति सक्रिय है। अमेरिका और चीन के मध्य बढ़ता तनाव विकासशील देशों के पक्ष में नही है,इसलिए तीसरी दुनिया के देशों को आधिपत्यवादी देशों के विरुद्ध एकजुट होने की आवश्यकता है। प्रोफेसर टी वी पाल के शब्दों में गुटनिरपेक्ष आंदोलन कमजोर राज्यों द्वारा महाशक्तियों के विरुद्ध सॉफ्ट बैलेंसिंग का एक उदाहरण है।
तीसरी दुनिया के देशों के पास महाशक्तियों के शक्ति संघर्ष को रोकने की सीमित क्षमता है, इसलिए इन्होंने नारमेटिव पॉवर के माध्यम से यह कार्य किया। नारमेटिव पॉवर का आशय शांति,सहयोग,निशस्त्रीकरण, विकास,सामरिक स्वायत्तता और विश्व व्यवस्था के निर्माण जैसे मूल्यों की समुच्चय से है। इन देशों के अनुसार गुटनिरपेक्ष आंदोलन जिस प्रशंसा का हकदार था,वह इसे कभी नहीं मिला, क्योंकि इसके प्रति सदा पूर्वाग्रह देखा गया।
वर्तमान विश्व में ऐसे अनेक अनसुलझे और नवीन मुद्दे हैं, जिसके लिए तीसरी दुनिया के देशों को सामूहिक रूप में कार्य करने की जरूरत है,जैसे गरीबी,अल्पविकास,नवउपनिवेशवाद, पर्यावरण निम्नीकरण, बाह्य ऋण,आतंकवाद आदि। चूंकि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था काफी परिवर्तनशील है ऐसे में यह आंदोलन विकासशील देशों के हितों के संरक्षण में प्रभावी होगा।
समकालीन भूमंडलीकृत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था पर अभी भी कुछ महाशक्तियों का ही नियंत्रण है। अभी भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था राष्ट्रीय संप्रभुता,समानता और स्वतंत्रता के स्थान पर शक्ति संतुलन द्वारा संचालित हो रही है। इसलिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन को इसके विरोध में सक्रिय करना ही होगा।
अब तक गुटनिरपेक्ष आंदोलन की उपलब्धियां भी महत्वपूर्ण रही है, जैसे-
महाशक्तियों के अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध
नाभिकीय निशस्त्रीकरण के लिए प्रयास
उपनिवेशवाद,रंगभेद की नीति की समाप्ति
तीसरी दुनिया के देशों में सुदृढ़ता
नवअंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मांग, आदि
कोविड आपदा के दौर में भारतीय प्रधानमंत्री ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के आभासी सम्मेलन में यह कहा था कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन दुनिया की नैतिक आवाज रही है। कोविड संकट ने स्थापित कर दिया है कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कई कमियां है। इसलिए आज वैश्वीकरण के एक नए रूप की जरूरत है,जो निष्पक्षता,समानता और मानवता के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अधिक से अधिक देशों के प्रतिनिधित्व पर आधारित हो
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में सुधार हेतु सुझाव
गुटनिरपेक्ष आंदोलन को प्रभावी बनाने के लिए संरचनात्मक और प्रकार्यात्मक स्तर पर बदलाव की जरूरत है। सर्वप्रथम इसे संस्थात्मक स्वरूप देने की आवश्यकता है। इसके लिए गुटनिरपेक्ष देशों का स्थायी सचिवालय होना चाहिए। इसकी सदस्यता के लिए वस्तुनिष्ठ मानदण्ड होंने चाहिए। साथ ही नीतिगत कार्ययोजना का स्पष्ट निर्धारण हो तथा समय समय पर इसकी समीक्षा होनी चाहिए। इसी प्रकार दक्षिण दक्षिण आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए भी पहल करनी चाहिए,जैसे वैश्वीक दक्षिण के देशों के लिए विकास बैंक की स्थापना,सदस्य देशों में परस्पर निवेश को बढ़ावा देना आदि। साथ ही सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु भी संयुक्त प्रयास होना चाहिए।
कंपाला में 19वें गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर द्वारा भारत का राष्ट्रीय वक्तव्य
भारत वसुधैव कुटुम्बकम, यानी दुनिया एक परिवार है, के विश्वास से प्रेरित है। 2019 में बाकू में NAM की बैठक के बाद से दुनिया में काफ़ी बदलाव आया है। हम सभी कोविड महामारी से तबाह हो गए हैं जिसके जख्म भरने में कई पीढ़ियाँ लग जाएँगी। ऐसे संघर्ष चल रहे हैं जिनके नतीजे दूर-दूर तक महसूस किए जा रहे हैं। गाजा, विशेष रूप से, हमारी चिंता का केंद्र है। जलवायु परिवर्तन तेज़ी से और नियमित रूप से विघटनकारी होता जा रहा है। ऐसे बहुत कम लोग हैं जिन्होंने इसके प्रभाव को महसूस नहीं किया है। कर्ज, मुद्रास्फीति और विकास चुनौतियों का त्रिकोण भी विकासशील देशों पर भारी पड़ रहा है।
इन गंभीर चिंताओं के पीछे दुनिया की प्रकृति है जिसका हम सामना कर रहे हैं। हमने उपनिवेशवाद के जुए को भले ही उखाड़ फेंका हो, लेकिन हम असमानता और वर्चस्व के नए रूपों से जूझ रहे हैं। वैश्वीकरण के युग में, हम आर्थिक संकेन्द्रण देख रहे हैं जो बाकी दुनिया को केवल बाजार या संसाधन के रूप में देखते हैं। हमारी छोटी-छोटी ज़रूरतें अक्सर सबसे दूर से बनाई जाती हैं। कोविड के अनुभव की चिंताओं ने इसे और भी स्पष्ट कर दिया है। हम राजनीतिक शुद्धता और सार्वभौमिकता के आख्यानों के भी अधीन हैं जो हमारी संस्कृति और परंपराओं को उचित नहीं ठहराते।
NAM के रूप में, हमें इन चुनौतियों का जवाब देना चाहिए। एक सुधारित संयुक्त राष्ट्र के साथ एक बहुध्रुवीय दुनिया महत्वपूर्ण है। अधिक क्षेत्रीय उत्पादन के साथ आर्थिक विकेंद्रीकरण भी महत्वपूर्ण है। लेकिन हमें सांस्कृतिक पुनर्संतुलन के लिए भी दबाव डालना चाहिए जहां सभी विरासतों का परस्पर सम्मान किया जाता है। अफ्रीकी संघ की सदस्यता का नेतृत्व करके, भारत ने अपने G20 प्रेसीडेंसी के दौरान दिखाया कि परिवर्तन संभव है। इससे सुधारित बहुपक्षवाद को प्रेरणा मिलनी चाहिए।
विश्व व्यवस्था को बदलने के लिए व्यावहारिक कदम उठाने की आवश्यकता है। क्षेत्रीय आर्थिक केंद्र, लचीली आपूर्ति श्रृंखला, पूर्वानुमानित गतिशीलता और विश्वसनीय डेटा प्रवाह बनाना आवश्यक है। इसी तरह, संधारणीय जीवनशैली के साथ जन-केंद्रित नीतियां भी आवश्यक हैं। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना प्रौद्योगिकी द्वारा प्रदान किए जाने वाले वादे का एक उदाहरण है। खाद्य, ऊर्जा और स्वास्थ्य सुरक्षा को संबोधित करना महत्वपूर्ण है, साथ ही महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास भी महत्वपूर्ण है। संप्रभुता का सम्मान करते हुए और व्यवहार्यता सुनिश्चित करते हुए कनेक्टिविटी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। और अगर हम वास्तव में गंभीर हैं तो जलवायु कार्रवाई और एसडीजी प्राप्ति के लिए पर्याप्त संसाधन होने चाहिए।
भारत 78 देशों में 600 महत्वपूर्ण परियोजनाओं के माध्यम से इस प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है। और उनमें से प्रत्येक हमारे भागीदारों की पसंद का सम्मान करता है। जहाँ तक अफ्रीका का सवाल है, 300 परियोजनाएँ और 45,000 प्रशिक्षण स्लॉट हमारी एकजुटता की अभिव्यक्ति हैं। जब कोविड ने हमला किया, तो हमने अपने देशों को टीका लगाते हुए 100 देशों के साथ टीके साझा किए। जब प्राकृतिक आपदाएँ हुईं, तो हम अक्सर विकासशील देशों के लिए सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वाले रहे हैं। G20 की अध्यक्षता करते हुए, हमने वैश्विक दक्षिण से शक्ति प्राप्त करने के लिए बैठक करने का विकल्प चुना। विश्व मित्र (दुनिया का मित्र) के रूप में भारत हमेशा साझा करने के लिए मौजूद रहेगा।
विकास और प्रगति शांति और स्थिरता पर आधारित हैं। हमारे वैश्विक अस्तित्व में, कहीं भी संघर्ष के परिणाम हर जगह होते हैं। हमने यूक्रेन के संबंध में देखा जब यह हमारे ईंधन, भोजन और उर्वरक आपूर्ति की बात आई।
अभी, गाजा में संघर्ष हमारे दिमाग में सबसे ऊपर है। इस मानवीय संकट के लिए एक स्थायी समाधान की आवश्यकता है जो सबसे अधिक प्रभावित लोगों को तत्काल राहत दे। हमें यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि आतंकवाद और बंधक बनाना अस्वीकार्य है। साथ ही, सभी देशों को हमेशा अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सम्मान करना चाहिए। यह भी जरूरी है कि संघर्ष क्षेत्र के भीतर या उससे बाहर न फैले। लेकिन अंतिम विश्लेषण में, हमें दो-राज्य समाधान की तलाश करनी चाहिए, जहां फिलिस्तीनी लोग सुरक्षित सीमाओं के भीतर रह सकें। हमारे सामूहिक प्रयासों को इसे साकार करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन अपने सातवें दशक में प्रवेश कर चुका है। उस अवधि में, दुनिया बदल गई है और साथ ही हमारी क्षमताएं और आत्मविश्वास भी बदल गया है। हमें अपने हक की मांग करने और अपनी मांगों को आगे बढ़ाने में और अधिक साहसी होना चाहिए। जितना अधिक हम एक-दूसरे को साझा करेंगे, सहयोग करेंगे और एक-दूसरे को मजबूत करेंगे, उतना ही हम दुनिया को बदलेंगे। गुटनिरपेक्ष आंदोलन की आवाज यहां सुनी जानी है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन की आवाज यहां रहने और बढ़ने के लिए है। आइए आज हम यह संदेश दें।
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