भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध
पाकिस्तान की भारत नीति
भारत पाकिस्तान के मध्य साझे सामाजिक सांस्कृतिक सम्पर्क होने के बावजूद दोनो देशों के सम्बंध आजादी के बाद से अत्यंत तनावपूर्ण रहे है।
इसका प्रमुख कारण पाकिस्तान की भारत विरोधी
नीतियां रही है,जो निम्नलिखित रही है-
1. पाकिस्तान दक्षिण एशिया में सदैव भारत की बराबरी करने का इच्छुक रहा है। यही कारण है कि पाकिस्तान द्वारा सदैव महाशक्तियों के साथ निकटतम सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया गया।
वस्तुतः पाकिस्तान की भू सामरिक अवस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान दक्षिण एशिया,पश्चिम एशिया और केंद्रीय एशिया की शक्ति राजनीति के साथ साथ हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़त बनाने के लिए प्रमुख भूमिका निभाता रहा है। इसीलिए महाशक्तियां भी पाकिस्तान पर अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयास करती रही है।
शीतयुध्द के दौर में पाकिस्तान अमेरिका के लिए फ्रंटलाइन स्टेट के रूप में था।अमेरिका के लिए पाकिस्तान निम्नलिखित रूप में महत्वपूर्ण था-
●शीतयुद्ध के दौर में पाकिस्तान सोवियत संघ की सामरिक घेरेबन्दी के लिए महत्वपूर्ण था।अमेरिका ने पाकिस्तान के माध्यम से हिन्द महासागर क्षेत्र में सोवियत संघ के प्रभाव विस्तार को रोकने में सफलता प्राप्त की थी।
●पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका दक्षिण एशिया में भी अपने प्रभाव को स्थापित करने का इच्छुक था,विशेषकर भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव निर्मित करने में
●2001 के बाद पाकिस्तान अमेरिका के लिए आतंक के विरुद्ध युद्ध मे महत्वपूर्ण सहयोगी रहा है।
वही वर्तमान में पाकिस्तान चीन के लिए फ्रंटलाइन स्टेट के रूप में महत्वपूर्ण हो गया है,क्योंकि-
● चीन सीपेक(CPEC) के माध्यम से हिन्द महासागर में प्रवेश का इच्छुक है।यह वैकल्पिक मार्ग उसके मलक्का दुविधा का ठोस समाधान है।
●चीन पाकिस्तान के माध्यम से भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव उतपन्न कर सकता है।पाकिस्तान दक्षिण एशिया और हैं महासागर क्षेत्र में भारत की सामरिक घेरेबन्दी में भी सहायक है।
●चीन पाकिस्तान के माध्यम से इस्लामिक विश्व मे अपने प्रभाव विस्तार का इच्छुक है।साथ ही झिंजियांग प्रान्त के उइयुगर मुस्लिम के मुद्दे पर भी चीन पाकिस्तान का सहयोग चाहता है।
●पाकिस्तान के सहयोग से ही चीन अफगानिस्तान में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है।
2.पाकिस्तान कश्मीर को अपूर्ण एजेंडा मानता है,इसलिए वह कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण करने का प्रयास करता रहा है। पाकिस्तान भारतीय सेना पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाता रहा है,जिससे भारत की वैश्विक छवि धूमिल हो सके। साथ ही पाकिस्तान कश्मीर में अलगाववादियों को समर्थन भी देता रहा है।
3.पाकिस्तान भारत को अपने अस्तित्व के संकट के रूप में देखता है,इसलिए डीप स्टेट के रूप में पाकिस्तान द्वारा न केवल सेना को शक्तिशाली बनाया गया है बल्कि सेना ही भारत के साथ संबंधों को निर्धारित करती है।वस्तुतः पाकिस्तान में सत्ता के तीन प्रमुख केंद्र है-पाकिस्तान की निर्वाचित सरकार,सेना और धार्मिक समूह।हालांकि सेना का प्रभाव पाकिस्तान में निर्णायक है।
4.पाकिस्तान द्वारा क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर भारत के घेरेबंदी का भी प्रयास किया गया है इसके लिए मुस्लिम उम्मा की धारणा के तहत भारत के विरुद्ध इस्लामी विश्व के देशों से समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करता रहा है।
5.पाकिस्तान द्वारा विदेश नीति के एक साधन के रूप में सीमा पार आतंकवाद का भी भारत के विरुद्ध प्रयोग किया जाता रहा है।
भारत की पाकिस्तान के प्रति परम्परागत विदेशनीति
1.भारत द्वारा सदैव पारस्परिक विवादों के शांतिपूर्ण और द्विपक्षीय समाधान पर बोल दिया जाता रहा है शिमला समझौते और लाहौर घोषणा पत्र में भारत की यह प्रतिबद्धता अभिव्यक्त भी होती है।
2.भारत सदैव शांत और स्थिर पड़ोस का समर्थक रहा है,इसलिए पंचशील नीति और गुजरात सिद्धांत के माध्यम से पाकिस्तान सहित सभी पड़ोसी देशों के साथ सहयोगपूर्ण संबंधों को प्राथमिकता देता रहा है।इसलिए भारत द्वारा कभी भी पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया गया।
3. भारत पाकिस्तान के साथ निरंतर और समग्र वार्ता का समर्थक रहा है क्योंकि इससे पाकिस्तान की लोकतांत्रिक और उदारवादी शक्तियां अधिक मजबूत होती है।
4.भारत पाकिस्तान के साथ संबंधों को बेहतर करने में दक्षेस की भूमिका को निर्णायक मानता रहा है भारत आधिकारिक वार्ता के साथ-साथ जनता के मध्य संवाद और संपर्क स्थापित करने की नीति का भी समर्थक रहा है।
भारत की वर्तमान पाकिस्तान नीति
1.भारत द्वारा परंपरागत आदर्शवादी नीति के स्थान पर अब अधिक यथार्थवादी नीति का अनुसरण किया जा रहा है जिसके तहत यह स्पष्ट किया गया है कि आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ नहीं हो सकता है। इसलिए जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध ठोस कार्यवाही नहीं करता तब तक उसके साथ वार्ता संभव नहीं है।
2.राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आतंकवाद और अलगाववाद के विरूद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति का अनुसरण किया जा रहा है। जैसे पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करना,कश्मीर घाटी में आतंकी संरचना को नष्ट करना, जम्मू कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे को समाप्त करना, अलगाववादियों के विरुद्ध ठोस कार्यवाही करना, सीमा प्रबंधन को प्रभावी बनाना आदि।
3.पाकिस्तान को क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करने का भी प्रयास किया जा रहा है। कूटनीतिक स्तर पर भारत द्वारा पाकिस्तान की आतंकवाद समर्थित छवि को विश्व के सामने सार्वजनिक किया गया,जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को पहली बार आतंकवाद के शरण स्थल के रूप में देखा गया। इसी प्रकार अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद भी ओआईसी के मंच पर भारत का विरोध नहीं हुआ।
वहीं राजनीतिक स्तर पर भारत द्वारा पहली बार बलूचिस्तान तथा गिलगित व बाल्टिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाया गया।
इसी प्रकार आर्थिक स्तर पर भारत ने पाकिस्तान से एमएफएन के दर्जे को वापस ले लिया।वही सिंधु नदी समझौते की समीक्षा का संकेत भी दिया गया और उपिक्षेत्रीय आर्थिक सहयोग जैसे बिम्सटेक को बढ़ावा दिया जा रहा है।
भारत की वर्तमान पाकिस्तान नीति की समीक्षा
भारत की वर्तमान पाकिस्तान नीति अधिक यथार्थवादी और राष्ट्रीय हितों से प्रेरित है। यह अधिक मुखर और आक्रामक विदेश नीति है। इससे पाकिस्तान पर अपनी वैश्विक छवि को बेहतर करने का दबाव निर्मित हुआ है वर्तमान पाकिस्तान सरकार न केवल आतंकी समूह के विरुद्ध ठोस कार्यवाही का संकेत दे रही है बल्कि स्वयं को भी आतंकवाद से पीड़ित देश के रूप में प्रस्तुत कर रही है।वस्तुतः वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पाकिस्तान चीन पर अपनी निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है।
दूसरी ओर वर्तमान भारत की नीति के तहत भारत में आतंकी संरचना और नेटवर्क को प्रभावी रूप में कमजोर किया जा रहा है। कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी और अलगाववादी तत्व कमजोर हुए हैं।
भारत-पाकिस्तान को क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करने में भी सफल रहा है। यहां तक कि पाकिस्तान को मुस्लिम उम्मा की धारणा से भी लाभ नहीं मिल रहा है।
वही बिम्सटेक के मंच पर क्षेत्रीय एकीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई है, जो दक्षेस में संभव नहीं था। इससे पाकिस्तान भारत के विरुद्ध पड़ोसी देशों में बिग ब्रदर सिंड्रोम की भावना को मजबूती नहीं दे पा रहा है।
हालांकि वर्तमान भारत पाकिस्तान की नीति पर निम्नलिखित आलोचना भी की जा रही है-
पाकिस्तान के साथ वार्ता ना होने से वहां की निर्वाचित सरकार और लोकतांत्रिक शक्तियों हासिये पर चली जाएंगी, जिससे भारत विरोध के नाम पर सेना और कट्टरवादी ताकते अधिक मजबूत हो जाएंगी।
वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पाकिस्तान की अतिनिर्भरता चीन पर बढ़ती जा रही है।इससे चीन पाकिस्तान का प्रयोग भारत के विरुद्ध कर सकता है, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा होगा।
सर्जिकल स्ट्राइक जैसे हार्ड पावर का प्रयोग पड़ोसी देशों में भारत के विरुद्ध असुरक्षा का भाव उत्पन्न कर सकता है।
भारत पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंध दोनों देशों के घरेलू जनमत को एक दूसरे के विरुद्ध निर्मित कर रहे हैं इससे भविष्य में भी संबंधों में सुधार की संभावना सीमित हो जाती है।
भारत पाकिस्तान के तनावपूर्ण सम्बंध दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय एकीकरण की प्रकिया को कमजोर कर रहे है।यहां तक कि दक्षेस अब एक मृतप्राय संगठन हो गया है।
क्या भारत को पाकिस्तान के साथ आधिकारिक वार्ता करनी चाहिए?
पक्ष में तर्क
1.इससे पाकिस्तान में निर्वाचित सरकार और लोकतांत्रिक शक्तियों मजबूत होगी तथा भारत विरोधी गैर लोकतांत्रिक शक्तियों कमजोर होगी।
2.इससे जनता के मध्य संवाद और संपर्क बढ़ेगा। सांस्कृतिक आदान-प्रदान से विश्वास का संकट दूर होगा तथा एक दूसरे के प्रति विरोधी जनमत सकारात्मक हो पाएगी।
3. वार्ता न करने से भारत की छवि हार्ड पावर देश के रूप में मजबूत हो रही है, जो अन्य पड़ोसी देशों में भी भारत के विरुद्ध असुरक्षा का भाव उत्पन्न कर सकती है,जबकि वार्ता प्रारंभ करने से भारत की विश्वसनीय एवं जिम्मेदार देश की छवि मजबूत होगी।
4.पाकिस्तान के साथ वार्ता दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय एकीकरण को गति देगा तथा दक्षेस पुनः प्रभावी हो पाएगा।
5. पाकिस्तान के साथ संबंधों के सामान्य होने पर ही भारत दक्षिण एशिया की शक्ति राजनीति से बाहर निकलकर हिंद प्रशांत क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका पर ध्यान दे पाएगा।
विपक्ष में तर्क-
1.जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध ठोस कार्यवाही नहीं करता तब तक वार्ता में बाधा आती रहेगी और ऐसे तनावपूर्ण माहौल में वार्ता का कोई महत्व नहीं रह जाता है।
2. पाकिस्तान की सरकार के साथ कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल सकता है, क्योंकि वहां डीप स्टेट के रूप में सेना वार्ता को सफल होने ही नहीं देगी।
3.पाकिस्तान पर वर्तमान नीति ने मनोवैज्ञानिक दबाव निर्मित किया है, इसलिए वार्ता को पुनः शुरू करना भारत की कमजोरी के रूप में देखा जा सकता है।
4.पाकिस्तान अभी भी निरंतर भारत विरोधी गतिविधियों में संलग्न है,जैसे हाल ही में पाकिस्तान द्वारा संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन से करना।
वस्तुतःभारत की वर्तमान नीति से पाकिस्तान पूर्णतया अलग-अलग नहीं हुआ है बल्कि चीन के साथ उसके सामरिक गठजोड़ अधिक मजबूत हुए है। भारत के लिए पाकिस्तान से बड़ा खतरा चीन है और चीन पाकिस्तान के माध्यम से भारत की प्रभावी सामरिक घेरेबन्दी में लगा हुआ है।
पाकिस्तान वर्तमान में संक्रमण काल के दौर से गुजर रहा है, इसलिए भारत को पाकिस्तान के प्रति अब अधिक आक्रामक नीति नहीं रखनी चाहिए बल्कि बैक चैनल डिप्लोमेसी के तहत गैर आधिकारिक वार्ता शुरू कर देनी चाहिए। जिससे भविष्य में वार्ता का एक सकारात्मक परिवेश निर्मित हो सके।
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