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Showing posts from July, 2024

गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता

                  गुटनिरपेक्ष आंदोलन    गुटनिरपेक्ष आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि  औपनिवेशिक शासन के अंत का शीत युद्ध के दौरान तीसरी दुनिया के देशों के मध्य एकता की आवश्यकता के आधार पर निर्मित हो गया था। यह आंदोलन वैश्विक शांति और सुरक्षा के संरक्षण की मांग पर आधारित है इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध तीसरी दुनिया के देशों द्वारा संचालित राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ही निर्मित हो गई थी, हालांकि इसका आधार 1947 में नई दिल्ली में आयोजित एशिया अफ्रीका देश के सम्मेलन में निर्मित हुआ। वहीं 1955 में आयोजित बांडुंग सम्मेलन में इसके मार्गदर्शक सिद्धांत निर्मित हुए थे। बांडुंग सम्मेलन में 29 एशियाई अफ्रीकी देशों की सहभागिता देखी गई। इस सम्मेलन में 10 सिद्धांतों की घोषणा की गई जो निम्नलिखित है- • संयुक्त राष्ट्र के चार्टर और उद्देश्यों व सिद्धांतों तथा मानवाधिकार के प्रति सम्मान, • सभी राष्ट्रों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति सम्मान  • सभी राष्ट्रों तथा नस्लों के मध्य समानता ...

भारतीय विदेशनीति का विकास

     भारतीय विदेशनीति का विकास भारतीय विदेशनीति के विभिन्न चरण वर्तमान भारतीय विदेशनीति भारतीय विदेशनीति में निरंतरता और परिवर्तन के तत्व भारतीय विदेशनीति का विकास ऐसे दौर में हुआ जब भारत के सामने वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर अनेक संकट विद्यमान थे। साथ ही आंतरिक स्तर पर राष्ट्र के एकीकरण की भी चुनौती थी। देश में सामाजिक आर्थिक असमानता व्यापक स्तर पर थी। ऐसे में देश के राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय विकास को प्रेरित करने वाली विदेश नीति आवश्यक थी। साथ ही भारत वैश्विक स्तर पर अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करने का इच्छुक था। इसी संदर्भ में भारत की विदेश नीति का विकास हुआ। प्रथम चरण(1947-1967) इस दौरान भारतीय विदेशनीति अधिक आदर्शवादी थी,जिसका उद्देश्य वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर शांति,सहयोग और समृद्धि को बढ़ावा देना था। इस दौरान भारत स्वयं को एशियाई शक्ति और तीसरी दुनिया के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने का इच्छुक भी था। भारत अपनी छवि एक जिम्मेदार देश के रूप में निर्मित करना चाहता था ना की विस्तारवादी देश के रूप में,इसलिए भारत द्वारा पंचशील और गुटनिरपेक्ष विद...

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में साम्राज्यों का उत्थान और पतन

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में साम्राज्यों का उत्थान और पतन प्राचीन काल में भारत और चीन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के दो प्रमुख केंद्र थे।विश्व के अन्य देशों के साथ इनके प्रभावी व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्पर्क थे।सिल्क ट्रेड रुट के माध्यम से इनका सम्पर्क मध्यपूर्व और यूरोप के साथ था। लेकिन मध्यकाल के प्रारंभ में भारत और चीन के सापेक्षिक महत्व में गिरावट देखी गयी। इस दौरान 27 BC में रोमन साम्रज्य का उभार देखा गया,जिसका साम्राज्य 476 AD तक रहा। जिसके बाद बाइजेंटाइन साम्राज्य का उदय हुआ,जिसका प्रभाव 1453 AD तक रहा।दूसरी ओर मध्य पूर्व में 1299 में आटोमन साम्रज्य का उदय हुआ,जो बाइजेंटाइन साम्रज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी।1453 में आटोमन साम्रज्य ने बाइजेंटाइन सामाज्य की राजधानी कॉन्स्टेंटिनोपल पर आक्रमण कर उस पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। कॉन्स्टेंटिनोपल ज्ञान-विज्ञान का केंद्र था। तुर्कों की विजय के बाद कुस्तुनतुनिया के विद्वान् भागकर रोम में शरण लिए,जहां पुनः प्राचीन ज्ञान विज्ञान पर चर्चा होने लगी। प्राचीन ज्ञान के प्रति यह आकर्षण ही यूरोप के पुनर्जागरण का कारण बना। कॉन्स्टेंटिनोपल...