भारतीय विदेशनीति का विकास
भारतीय विदेशनीति के विभिन्न चरणप्रथम चरण(1947-1967)
इस दौरान भारतीय विदेशनीति अधिक आदर्शवादी थी,जिसका उद्देश्य वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर शांति,सहयोग और समृद्धि को बढ़ावा देना था। इस दौरान भारत स्वयं को एशियाई शक्ति और तीसरी दुनिया के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने का इच्छुक भी था। भारत अपनी छवि एक जिम्मेदार देश के रूप में निर्मित करना चाहता था ना की विस्तारवादी देश के रूप में,इसलिए भारत द्वारा पंचशील और गुटनिरपेक्ष विदेशनीति का अनुसरण किया गया।
इस दौरान भारतीय विदेश नीति की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थी
1.भारत द्वारा क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए पड़ोसी देशों के सम्बंध में पंचशील नीति का अनुसरण किया गया। पंचशील नीति का उद्देश्य निम्नलिखित था-
•इस नीति के माध्यम से भारत क्षेत्रीय स्तर पर शांति एवं स्थिरता स्थापित करने का इच्छुक था।वह शीत युद्ध के दौर में दक्षिण एशिया को शक्ति राजनीति का केंद्र नही बनने देना चाहता था।
•भारत पड़ोसी देशों के साथ तनावपूर्ण सम्बन्धो के स्थान पर सहयोगपूर्ण सम्बन्ध बनाने का इच्छुक था,जिससे वह विकास की गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित कर सके। इसलिए भारत पड़ोसियों के साथ सैन्य संघर्ष से बचना चाहता था।
•भारत पड़ोसी देशों के साथ विश्वास संकट को दूर करना चाहता था। इससे वह पड़ोसी देशों को यह संदेश भी देना चाहता भी था कि भारत उनके लिए अवसर है न कि खतरा। वस्तुतः भारत विस्तारवाद नही बल्कि विकासवाद का समर्थक था।
•इसके माध्यम से भारत एक जिम्मेदार और विश्वसनीय देश के रूप में अपनी छवि निर्मित करना चाहता था,जिससे सॉफ्ट पॉवर के रूप में भारत को मान्यता मिल सके।
2.भारत वैश्विक स्तर पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का इच्छुक था। इस क्रम में उसके द्वारा गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से एशियाई अफ्रीकी एकता पर बल दिया गया। यह आंदोलन शक्ति राजनीति और गुटीय राजनीति के विरुद्ध था, जो अंतरराष्ट्रीय कानून द्वारा संचालित विश्व का समर्थन करता था। भारत द्वारा गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद,रंगभेद आदि का विरोध किया गया। वस्तुतः भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का वैचारिक नेतृत्वकर्ता था। वहीं भारत शीतयुद्ध की गुटीय राजनीति के दौर में स्वतंत्र और स्वायत्त विदेश नीति का समर्थक था। नेहरू जी के शब्दों में भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के गुण और दोष के आधार पर विवेकपूर्ण निर्णय लेगा।
भारत की गुटनिरपेक्ष विदेशनीति का उद्देश्य निम्नलिखित था-
•इस नीति के माध्यम से भारत ने स्वयं को शीत युद्ध की गुटीय राजनीति से दूर रखा,जिससे उसकी सामरिक स्वायत्तता बनी रहे। दूसरे शब्दों में भारतीय विदेशनीति किसी महाशक्ति के निर्देशन में नही बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार संचालित होती रही।
•भारत गुटनिरपेक्ष विदेशनीति के माध्यम से तीसरी दुनिया के देशों के नेतृत्वकर्ता के रूप में लोकप्रिय हुआ,जिसने भारत के वैश्विक प्रभाव में वृद्धि की।
•गुटनिरपेक्ष नीति में पर्याप्त लोचशीलता थी,जिसके कारण भारत अमेरिका और सोवियत संघ दोनो से सहयोग प्राप्त कर सका। साथ ही इस नीति के माध्यम से भारत दोनो महाशक्तियों को संतुलित कर सका।
•गुटनिरपेक्ष नीति के कारण भारत की छवि विश्वसनीय और जिम्मेदार के रूप में निर्मित हुई और सॉफ्ट पॉवर के रूप में भारत को मान्यता मिली।
3.भारत प्रारंभ से ही अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय कानून में विश्वास करता रहा है। इसके द्वारा न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून और संधियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया गया, बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी भी की गई।
4.भारत द्वारा वैश्विक निशस्त्रीकरण का भी समर्थन किया गया। यहां तक की 1954 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत द्वारा व्यापक, सार्वभौमिक और पूर्ण निशस्त्रीकरण का प्रस्ताव रखा गया।
5.भारत द्वारा मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति का पालन किया गया, जिससे पूंजीवादी और समाजवादी दोनों अर्थव्यवस्थाओं का सहयोग से मिल सके।
इस चरण में भारतीय विदेशनीति के आधारभूत सिद्धान्त निर्मित किए गए। विदेशनीति के बुनियादी मूल्यों का विकास भी इसी चरण में हुआ,लेकिन इस चरण में भारतीय विदेशनीति के समक्ष अनेक गम्भीर चुनौतियां उपस्थित हुयी। प्रोफेसर एस डी मुनि के अनुसार इस चरण में भारतीय विदेशनीति के समक्ष सुरक्षा संकट,विकास संकट और पहचान का संकट गम्भीर रूप में उपस्थित हुआ। वस्तुतः नेहरू जी की विदेशनीति को अधिक आदर्शवादी माना गया। यह तर्क दिया गया कि उनके द्वारा शांति और सहयोग पर तो बल दिया गया, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की उपेक्षा कर दी गई। इस दौर में भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता का अनुसरण किया गया,जिससे राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता भी करना पड़ा। नेहरूवियन विदेश नीति में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और कानूनों में अधिक विश्वास व्यक्त किया गया, जबकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति शक्ति संतुलन के सिद्धांतों पर कार्य करती है। भारत द्वारा दोनों ही गुटों से सहयोग प्राप्त करने की कोशिश की गयी, लेकिन दोनों ही गुट भारत के प्रति संशयशील बने रहे, इसलिए भारत को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया। भारत को गंभीर सुरक्षा संकट का सामना करना पड़ा विशेषकर 1962 में चीन द्वारा भारत के अक्साई चिन क्षेत्र पर नियंत्रण के बाद। इस अतिक्रमण ने भारत की वैश्विक छवि को धूमिल किया और उसकी छवि एशियाई शक्ति के स्थान पर दक्षिण एशियाई शक्ति के रूप में सीमित हो गई। भारत ने पड़ोसी देशों और विकासशील देशों के साथ उदार और सहयोगी रुख अपनाया, लेकिन इन देशों के द्वारा भारत के साथ सौदेबाजी की गई और अधिकांश मुद्दों पर भारत को एशियाई अफ्रीकी देशों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया जैसे 1962 और 1965 के युद्ध में। इस दौरान खाद्यान संकट,उच्च मुद्रास्फीति, बेरोजगारी जैसे आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ा।
दूसरे चरण की विदेशनीति(1967-1989)
भारत की विदेशनीति प्रारम्भिक चरण में अधिक आदर्शवादी थी,लेकिन दूसरे चरण की विदेशनीति अधिक यथार्थवादी थी। इस चरण में शांति और सहयोग की तुलना में राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय शक्ति पर अधिक बल दिया गया। साथ ही नैतिक मान्यताओं के स्थान पर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी गयी।
इस क्रम में भारत द्वारा सैन्य आधुनिकीकरण पर विशेष बल दिया गया। इस दौरान DRDO की केंद्रीय भूमिका को निर्धारित किया गया और अर्द्ध सैन्य बलों की स्थापना की गयी। दूसरी ओर अमेरिका चीन पाकिस्तान के त्रिगुट से उत्पन्न खतरे को ध्यान में रखते हुए सोवियत संघ के साथ मैत्री सन्धि की गई।
इसी प्रकार अपने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भारत ने शांतिपूर्ण नाभिकीय परीक्षण भी किया। इससे भारत के वैश्विक प्रभाव में भी मदद मिली। सोवियत संघ ने न केवल भारत को सैन्य उपकरणों की आपूर्ति की बल्कि भारत के औद्योगिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1962 के भारत चीन युद्ध के उपरांत क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत की छवि धूमिल हुई थी, लेकिन इस चरण में पुनः भारत ने अपनी शक्ति का प्रभावी प्रदर्शन किया। बांग्लादेश के गठन में भारत की केंद्रीय भूमिका रही तो वही 1974 में भारत ने नाभिकीय हथियारों का सफल परीक्षण कर यह स्पष्ट कर दिया कि वह भी नाभकीय हथियार अर्जित करने की क्षमता रखता है। इस चरण में भारतीय विदेश नीति के बुनियादी मूल्यों से विचलन नहीं हुआ। तीसरी दुनिया के देशों के प्रखर आवाज के रूप में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका थी। भारत द्वारा गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मंच पर नव अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की मांग की गई,अन्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदलने पर बल दिया गया। इंदिरा गांधी ने स्पष्ट रूप से यह भी कहा की कोई पहली,दूसरी या तीसरी दुनिया नहीं है,अपितु पूरा विश्व एक है। इस दौर में भी भारत पंचशील नीति के आधार पर पड़ोसी देशों के साथ सहयोगपूर्ण संबंधों पर बल देता रहा।भारत द्वारा अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता के लिए प्रयास किये गए। हरित क्रांति के माध्यम से खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त हुई तो वही औद्योगिक विकास को भी गति दिया गया।
हालांकि इस चरण की विदेश नीति में सोवियत संघ पर भारत की अतिनिर्भरता ने भारत के सामरिक विकल्पों को सीमित कर दिया था। इसलिए सोवियत संघ के विघटन के बाद भारतीय विदेश नीति के समक्ष निम्नलिखित संकट उत्पन्न हुए
• नए विश्व व्यवस्था में नए सामरिक भागीदार की आवश्यकता थी,क्योंकि अब रूस पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका पर निर्भर हो गया था अमेरिकी दबाव में आकर ही 1993 में वह भारत को क्रायोजेनिक इंजन देने से इनकार कर चुका था।
• रूस अब कमजोर हो चुका था, जिससे भारत को रक्षा हथियारों की आपूर्ति बाधित हो गई थी। इसलिए भारत को नए रक्षा बाजार की आवश्यकता थी।
•अमेरिका के नेतृत्व वाले एकध्रुवीय विश्व में अपनी स्वतंत्र और स्वायत्त विदेश नीति को बनाए रखने की भी चुनौती थी।
• दूसरे चरण की विदेश नीति में भारत द्वारा अंतर्मुखी विदेश नीति का पालन किया गया था,जिससे विश्व के अधिकांश देशों और क्षेत्र के साथ भारत के कूटनीतिक संपर्क स्थापित नहीं हो पाए थे।दूसरी ओर भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति बंद अर्थव्यवस्था की थी जबकी 1990 के बाद विश्व में आर्थिक कारकों की भूमिका बढ़ चुकी थी।
तीसरे चरण की विदेशनीति(1990-2014)
1990 के बाद सोवियत संघ के विघटन के साथ ही शीत युद्ध का अंत हो गया। भारत का प्रमुख सामरिक भागीदार रूस अब कमजोर हो गया था। इससे भारत के लिए रक्षा हथियारों की आपूर्ति का संकट भी उत्पन्न हो गया था। दूसरी ओर अमेरिका के नेतृत्व में एकध्रुवीय विश्व मे अपनी सामरिक स्वयत्तता को बनाये रखने की भी चुनौती थी।
इसी पृष्ठभूमि में भारत द्वारा अधिक यथार्थवादी विदेशनीति का अनुसरण किया जाने लगा,जहां भारत द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों को स्पष्ठ प्राथमिकता दी गयी। अभी तक जिन नैतिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रीय हितों से समझौता किया जा रहा था,उसके स्थान पर अधिक व्यवहारिक दृष्टिकोण को स्वीकार किया गया। इसी क्रम में म्यांमार और इजरायल जैसे देशों के साथ कूटनीतिक सम्बन्धो को स्थापित किया गया और अमेरिका के साथ सम्बन्धो को भी सामान्य बनाने का प्रयास किया गया। दूसरी ओर भारत द्वारा अपनी विदेशनीति को अधिक विविधीकृत स्वरूप दिया गया। इसके तहत पूर्व की ओर देखो विदेशनीति प्रारम्भ की गई। वही अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ भी निकटता बढ़ाने के लिए पहल किया गया। वैश्वीकरण के इस दौर में भारत ने विश्व के साथ एकीकरण को भी गति दी। भारत ने अपनी बन्द अर्थव्यवस्था को खुली अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर आधारित आर्थिक सुधारों को प्रारम्भ किया। राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नाभिकीय हथियार का अर्जन किया गया। पड़ोसियों के साथ रचनात्मक सम्बन्धो की स्थापना के लिये गुजराल डॉक्ट्रिन का अनुसरण किया गया।
हालांकि इस दौर में भारतीय विदेश नीति के समक्ष अनेक संकट भी उपस्थित हुए, जैसे चीन द्वारा भारत की सामरिक घेरेबन्दी का प्रयास किया गया विशेषकर मोतियों की माला नीति के तहत। इससे भारत के पड़ोस में चीन की उपस्थिति मजबूत हुई और पड़ोसी देशों द्वारा भारत के स्थान पर चीन को प्राथमिकता दी जाने लगा। वही 1990 के बाद गठबंधन सरकारों के दौर में विदेश नीति में क्षेत्रीय दलों का हस्तक्षेप बढ़ता गया, जिसके कारण श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे देशों के साथ संबंध तनावपूर्ण हो गए। भारत की छवि सॉफ्ट पावर देश के रूप में ही बनी रही और हार्ड पावर के रूप में निर्मित नहीं हो सकी, जबकि वैश्विक प्रभाव के लिए सॉफ्ट पावर के साथ-साथ हार्ड पावर भी आवश्यक होता है।
वर्तमान सरकार की विदेशनीति
हाल के वर्षों में वैश्विक शक्ति राजनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ रहे है,जिन्होंने भारतीय विदेशनीति को भी प्रभावित किया है। इन परिवर्तित परिस्थितियों में वर्तमान भारतीय विदेशनीति की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है-
1.भारत हिन्द प्रशांत क्षेत्र में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। इस संदर्भ में भारत हिन्द प्रशांत क्षेत्र के विशुद्ध सुरक्षा प्रदायक के रूप में अपनी भूमिका निर्धारित कर रहा है।आतंकवाद, तस्करी,प्राकृतिक आपदा,समुद्री डकैती जैसे सुरक्षा खतरों के समाधान में भारत सक्रिय भूमिका निभा रहा है। दूसरी ओर भारत इस क्षेत्र के देशों के विकास भागीदार के रूप में भी अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है।
2.वर्तमान विदेशनीति में आर्थिक कूटनीति पर विशेष बल दिया जा रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था से एकीकरण के लिए भारत द्वारा निरन्तर प्रयास किये जा रहे है।जैसे-मेक इन इंडिया,इज ऑफ डूइंग बिजनेस,fdi reform आदि।
3.भारतीय विदेशनीति में शांत,स्थिर और एकीकृत पड़ोस पर विशेष बल दिया जा रहा है। इसलिए पड़ोस प्रथम नीति और सागर नीति के माध्यम से निकटतम पड़ोस के साथ साथ सामुद्रिक पड़ोस के साथ निकटतम सम्बन्ध बनाने के प्रयास किये जा रहे है।
4.भारत द्वारा वैश्विक महाशक्तियों के साथ निकटतम और समकक्षता पर आधारित सम्बन्धो की स्थापना के लिए प्रयास किया जा रहा है।
5.भारत वैश्विक नीति निर्धारक के रूप में भी अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है,जैसे अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, cdri, ग्लोबल biofuel aaliance आदि का भारत द्वारा संचालन।
6.भारत सॉफ्ट पावर के साथ साथ हार्ड पावर के रूप में भी स्वयं को स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।
7.भारत प्रगमेटिक और नवाचारी विदेशनीति का भी अनुसरण कर रहा है।जैसे पैराडिप्लोमैसी,कल्चरल डिप्लोमेसी, मेडिकल डिप्लोमेसी आदि।
वर्तमान सरकार की विदेशनीति की उपलब्धियां
1.वर्तमान विदेशनीति में अधिक ऊर्जा और नीतिगत सक्रियता देखी जा रही है। पड़ोस प्रथम नीति,एक्ट ईस्ट नीति,लिंक वेस्ट नीति,सागर नीति आदि के माध्यम से विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में भारत का प्रभाव विस्तार हुआ है।
2.भारत के वैश्विक छवि में भी गुणात्मक सुधार आया है। वर्तमान में भारत को हिन्द प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख सुरक्षा प्रदायक और विकास भागीदार के रूप में मान्यता प्राप्त है। भारत को चीन के विश्वसनीय विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है।
वही वैश्विक नीति निर्धारक के रूप में भी भारत की भूमिका स्थापित हुई है।जैसे-
-भारत के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन,ग्लोबल biofuel अलायंस का संचालन
-ऑस्ट्रेलिया समूह,वजेनर समूह और MTCR समूह की सदस्यता मिलना
-क्वैड और i2u2 जैसे सामरिक समूहों का सदस्य होना।
3.हाल के वर्षों में भारत भी चीन की सामरिक घेरेबन्दी करने में सफल हो रहा है। चीन द्वारा स्ट्रिंग ऑफ पर्ल पालिसी के तहत भारत की सामरिक घेरेबन्दी की जा रही थी,लेकिन भारत डायमंड नेकलेस पालिसी के तहत चीन की सामरिक घेरेबन्दी में सफल हो रहा है। वर्तमान में विश्व के अधिकांश देश हिन्द प्रशांत क्षेत्र में भारत को चीन के विकल्प के रूप में देख रहे है।
4.सॉफ्ट पावर के रूप में भारत की वैश्विक लोकप्रियता में वृद्धि हुई है। विश्व के अधिकांश देश भारत के साथ आर्थिक भागीदारी को मजबूत कर रहे है। निवेश परिवेश बेहतर होने के कारण अधिकांश बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत मे निवेश के लिए आकर्षित हो रही है। भारतीय डायस्पोरा की भूमिका भारत के सांस्कृतिक प्रभाव विस्तार में केंद्रीय हो गयी है।
वर्तमान विदेशनीति की सीमाएं
1.वर्तमान विदेशनीति के समक्ष सामरिक दुविधा की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। भारत हिन्द प्रशांत क्षेत्र की शक्ति राजनीति का एक भाग बन गया है। भारत पर अमेरिकी गुट का सदस्य होने का भी आरोप लग रहा है। वही यूक्रेन संकट के दौर में रूस के साथ भारत की बढ़ती निकटता भी भारत की वैश्विक छवि को प्रभावित कर रही है।
2.भारत की परम्परागत गुटनिरपेक्ष विदेशनीति पर गम्भीर प्रश्न उपस्थित हुए है। अमेरिका से अत्यधिक निकटता और क्वैड जैसे सामरिक संगठनों की सदस्यता भारत की गुटनिरपेक्ष नीति को कमजोर कर रही है। इससे भारत के अपने परम्परागत मित्रो रूस,ईरान,वेनेजुएला के साथ सम्बन्धो में असहजता बढ़ी है।
3.भारत के पड़ोस में भारत विरोधी भावनाएं मजबूत हुई है। पाकिस्तान,मालदीव के साथ सम्बन्ध अत्यधिक तनावपूर्ण हुए है तो अफगानिस्तान में नीतिगत दुविधा बढ़ी है।
4.चीन के साथ तनावपूर्ण सम्बन्धो के कारण सीमा विवाद गहरा हुआ है। वही चीन एशिया में भारत की तुलना में सामरिक बढ़त की स्थिति में है,विशेषकर अपने डीप पॉकेट के कारण।
भारतीय विदेश नीति में निरंतर एवं परिवर्तन के तत्व
निरंतरता के तत्व
विदेश नीति के आधारभूत सिद्धांतों एवं आदर्श में निरंतरता बनी हुई है। भारत अभी भी एक समान,सहयोगपूर्ण और लोकतांत्रिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पक्षधर है। इस संबंध में एशियाई अफ्रीकी देशों के नेतृत्वकर्ता के रूप में भारत अपनी भूमिका अलग-अलग मंचों पर प्रदर्शित कर रहा है। शांत, सुरक्षित और स्थिर पड़ोस अभी भी भारत की मुख्य प्राथमिकता है। भारतीय विदेश नीति अभी भी गुटनिरपेक्षता पर आधारित है। अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस के साथ आर्थिक संबंधों को बनाए रखना इसका प्रमाण है। इसी प्रकार पंचशील नीति भी पड़ोस प्रथम नीति के रूप में अभी प्रासंगिक है। भारत सदैव बहुपक्षीयतावाद का समर्थन करता रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित विश्व व्यवस्था का समर्थक रहा है। वर्तमान विदेश नीति में भी संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति आस्था बनी हुई है। भारत किसी भी आधिपत्यवादी नीति का विरोध कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के द्विपक्षीय संबंध भी परंपरागत नीति के ही अनुरूप है,जैसे पड़ोस प्रथम नीति पंचशील नीति की तो अब एक्ट ईस्ट नीति लुक ईस्ट नीति की प्रासंगिकता को दर्शाता है। भारतीय विदेश नीति में सामरिक स्वायत्तता के तत्व प्रारंभ से ही रहे। वर्तमान में भी भारत इसी आधार पर अमेरिका या रूस जैसी महाशक्तियों के साथ संबंध निर्मित कर रहा है। आर्थिक उदारीकरण के बाद से ही भारतीय विदेश नीति में आर्थिक कूटनीति पर विशेष बल दिया जा रहा है। इसी क्रम में वर्तमान सरकार भी मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी,आत्मनिर्भर भारत जैसे प्रयासों से इसे गति दे रही है।
परिवर्तन के तत्व
भारतीय विदेश नीति वर्तमान में अधिक प्रैगमेटिक है, जो हिंद प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा प्रदायक और विकास भागीदार के रूप में अपनी भूमिका निर्मित कर रहा है। यही कारण है कि भारत को अब हिन्द प्रशांत क्षेत्र के नेतृत्वकर्ता के रूप में मान्यता प्राप्त कर रहा है। वर्तमान विदेश नीति नॉन एलाइनमेंट के स्थान पर मल्टी एलाइनमेंट की नीति पर आधारित है, जिसके तहत विश्व के सभी प्रमुख शक्तियों के साथ सामरिक भागीदारी निर्मित की जा रही है। इसे भारत की मिनी लैटरलिज्म की नीति के रूप में भी देखा जा सकता है, जैसे जापान-अमेरिका-भारत समूह,क्वॉड समूह,आईटूउटू समूह आदि। भारत द्वारा सॉफ्ट पावर के साथ-साथ हार्ड पावर के रूप में भी अपनी छवि निर्मित की जा रही है। भारत द्वारा वैश्विक नीति निर्धारक के रूप में अपनी भूमिका बढ़ाई जा रही है,जैसे अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का नेतृत्व। वही सांस्कृतिक कूटनीति को अब अधिक संस्थागत आधार दिया जा रहा है, जैसे रामायण सर्किट, करतारपुर कॉरिडोर आदि। डायस्पोरा के साथ प्रत्यक्ष संवाद और भागीदारी पूर्ण संबंधों पर विशेष बल दिया जा रहा है। विदेश नीति में राज्यों की भूमिका पहले से अधिक बड़ी है,जो पैराडिप्लोमैसी के रूप में संस्थागत रूप ले रही है।
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