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अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में साम्राज्यों का उत्थान और पतन

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में साम्राज्यों का उत्थान और पतन


प्राचीन काल में भारत और चीन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के दो प्रमुख केंद्र थे।विश्व के अन्य देशों के साथ इनके प्रभावी व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्पर्क थे।सिल्क ट्रेड रुट के माध्यम से इनका सम्पर्क मध्यपूर्व और यूरोप के साथ था।

लेकिन मध्यकाल के प्रारंभ में भारत और चीन के सापेक्षिक महत्व में गिरावट देखी गयी। इस दौरान 27 BC में रोमन साम्रज्य का उभार देखा गया,जिसका साम्राज्य 476 AD तक रहा। जिसके बाद बाइजेंटाइन साम्राज्य का उदय हुआ,जिसका प्रभाव 1453 AD तक रहा।दूसरी ओर मध्य पूर्व में 1299 में आटोमन साम्रज्य का उदय हुआ,जो बाइजेंटाइन साम्रज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी।1453 में आटोमन साम्रज्य ने बाइजेंटाइन सामाज्य की राजधानी कॉन्स्टेंटिनोपल पर आक्रमण कर उस पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। कॉन्स्टेंटिनोपल ज्ञान-विज्ञान का केंद्र था। तुर्कों की विजय के बाद कुस्तुनतुनिया के विद्वान् भागकर रोम में शरण लिए,जहां पुनः प्राचीन ज्ञान विज्ञान पर चर्चा होने लगी। प्राचीन ज्ञान के प्रति यह आकर्षण ही यूरोप के पुनर्जागरण का कारण बना। कॉन्स्टेंटिनोपल के पतन का एक और महत्त्वपूर्ण प्रभाव हुआ। यूरोप और पूर्वी देशों के बीच व्यापार का स्थल मार्ग सिल्क ट्रेड रुट अब बंद हो गया। जिसके बाद पूर्वी देशों से सम्पर्क के लिए नए वैकल्पिक मार्ग की खोज होने लगी। इसी क्रम में कोलंबस, वास्कोडिगामा और मैगलन ने अनेक देशों का पता लगाया। यूरोप में भौगोलिक खोज के इन प्रयासों ने मानवीय क्षमता के महत्व को स्थापित किया। भौगोलिक खोजो से प्राकृतिक घटनाओं की वैज्ञानिक व्याख्या की प्रेरणा मिली।


इसी क्रम में यूरोप में धार्मिक सुधार आंदोलन,वैज्ञानिक क्रांति,औद्योगिक क्रांति और उदारवादी विचारधारा के उभार ने यूरोप में आधुनिक विचारों और संस्थाओं को स्थापित किया। इन परिवर्तनों ने यूरोप को वैश्विक शक्ति का नया केंद्र बना दिया। जबकि इसी समय आटोमन साम्राज्य निरन्तर कमजोर हो रहा था। यहां परम्परागत व्यवस्था ही बनी रही,न तो धार्मिक सुधार के प्रयास हुए और ना ही वैज्ञानिक विकास के लिए कोई प्रयास किये गए। इसके विपरीत 18 वी सदी में यहां वहाबी आंदोलन प्रारम्भ हुआ,जिसके तहत आटोमन साम्राज्य के पिछड़ेपन का कारण धर्म से विचलन माना गया,परिणामस्वरूप मध्यपूर्व में धार्मिक मूल्यों को और कठोरता से लागू किया जाने लगा।


ऑटोमन साम्राज्य के पतन और यूरोप के उभार में ब्रिटेन की भूमिका केंद्रीय रही। आधुनिक विश्व में ब्रिटेन की सर्वोच्चता स्थापित हुई और इसके लिये निम्नलिखित कारक उत्तरदायी थे-

1.ब्रिटेन एक द्विपीय देश है,जो यूरोप की मुख्य भूमि की से उत्पन्न खतरों से सुरक्षित था। समुद्र इसके लिए प्राकृतिक किले की भांति था।

2.ब्रिटेन में ही पहली बार वैज्ञानिक क्रांति प्रारम्भ हुई,जिसने यहां औद्योगिक क्रांति का आधार रखा। इसका एक कारण यह भी था कि यहां प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता भी थी।

3.वैज्ञानिक क्रांति के कारण ब्रिटेन एक तकनीकी शक्ति भी था।

4.ब्रिटेन इस समय विश्व की सबसे बड़ी नौसैन्य शक्ति भी था।

5.ब्रिटेन के प्रभाव का सबसे प्रमुख कारण इसकी वैचारिक शक्ति थी। ब्रिटेन ने सिविलाइजिंग मिशन के जरिये विश्व के अन्य क्षेत्रों में अपने प्रभाव का विस्तार किया,जिसे श्वेत व्यक्तियों के भार सिद्धान्त के रूप में देखा गया।

6.ब्रिटेन अपनी सैन्य शक्ति के माध्यम से भारत सहित एशिया के अनेक देशों में उपनिवेशों की स्थापना में सफल रहा।


लेकिन यूरोप में ब्रिटेन की सर्वोच्चता को समय समय पर अन्य शक्तियां चुनौती देती रही। यह शक्ति राजनीति जल्द ही यूरोप में प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण भी बनी। इसी के साथ ब्रिटेन की वैश्विक सर्वोच्चता भी दूसरे विश्वयुद्ध के साथ समाप्त हो गयी,क्योंकि अब अमेरिका और सोवियत संघ के रूप में दो नयी वैश्विक शक्तियों का उदय हुआ। इन दोनों वैश्विक शक्तियों के मध्य वैश्विक सर्वोच्चता के लिए शक्ति संघर्ष प्रारम्भ हुआ।


इस दौरान अमेरिका की वैश्विक सर्वोच्चता निम्नलिखित कारणों से स्थापित हो रही थी-

1.अमरीका आधुनिक अर्थव्यवस्था का केंद्र बन चुका था,जहाँ उद्यमशीलता और नवाचार की संस्कृति ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विकास का अवसर दिया। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर उसका प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो रहा था। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेनवुडस संस्थाओं के माध्यम से उसने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके साथ ही अमेरिका डॉलर को सर्वप्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्रा स्थापित करने में भी सफल रहा।

2.अमेरिकी रक्षा कम्पनियों ने उसे विश्व के हथियारों के कारखाने के रूप में निर्मित कर दिया। उसके पास अत्याधुनिक हथियार उपलब्ध थे। अमेरिका पहला नाभिकीय शक्ति सम्पन्न देश भी था और इसका प्रयोग करने वाला इकलौता देश भी था। अमेरिका ने अपनी सैन्य सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए सैन्य गठबंधनों का भी विकास किया,जैसे नाटो,सीटो, सेंटो आदि। इसके साथ ही अमेरिका ने विश्व मे 5 सुरक्षा कमांडो की भी स्थापना की।

3.अमेरिका प्रमुख वैश्विक तकनीकी शक्ति भी था।

4.अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व मे अपनी वैचारिक शक्ति भी स्थापित कर लिया था। अमेरिकी जीवनशैली पूरे विश्व मे लोकप्रिय हो गयी थी।


इसी समय सोवियत संघ भी एक प्रमुख आर्थिक,सैन्य और तकनीकी शक्ति के रूप में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा था।सोवियत संघ की समाजवादी विचारधारा भी विकासशील देशों में लोकप्रिय हो रही थी।

अमेरिका और सोवियत संघ की इस प्रतिद्वंतिता ने शीत युद्ध की स्थिति उतपन्न कर दी। शीत युद्ध प्रत्यक्ष युद्ध के स्थान पर मानसिक रूप से लड़ा जाने वाला युद्ध था,जहाँ युद्ध की परिस्थितियां तो विद्यमान थी लेकिन प्रत्यक्ष रूप में युद्ध नही लड़ा जा रहा था। शीत युद्ध दो महाशक्तियों के मध्य युद्ध तो था ही,साथ ही दो विचारधाराओं पूंजीवाद बनाम साम्यवाद का भी युद्ध था।


1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ शीत युद्ध का भी अंत हो गया,जिसने एक नई विश्व व्यवस्था को जन्म दिया,जिसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थी-

1.शीत युद्ध के अंत के साथ ही अमेरिका के नेतृत्व में एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का विकास हुआ। अमेरिका ने इस नई विश्व व्यवस्था को लोकतंत्र, मानवाधिकार और बाजारवादी अर्थव्यवस्था पर आधारित माना।

2.1990 के बाद वाशिंगटन सहमति की धारणा लोकप्रिय हुई,जिसके तहत विश्व मे बाजारवादी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया गया। इस प्रकार वर्तमान वैश्विक राजनीति भू अर्थ प्रधान हो गयी और इसने अन्तरनिर्भर विश्व को बढ़ावा दिया।

3.अमेरिका के नेतृत्व में विश्व एकध्रुवीय जरूर हुआ था,लेकिन धीरे धीरे यह एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय विश्व की ओर गतिशील होने लगा,जहाँ टाइगर इकॉनमी के रूप में दक्षिण कोरिया,हांगकांग,ताइवान और सिंगापुर जैसे एशियाई देशों ने तीव्र आर्थिक संवृद्धि दर्ज की।इसी प्रकार चीन,भारत जैसे उभरती शक्तियां विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव ला रही थी।इस प्रकार वैश्विक शक्ति सन्तुलन अब यूरो अटलांटिक क्षेत्र से एशिया प्रशांत में स्थानांतरित हो गया।

4.1990 के बाद वैश्वीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा मिला और विश्व के एकीकरण को गति मिली।

5.वर्तमान सूचना समाज मे प्रत्येक देश अपनी वैश्विक छवि के लिए संवेदनशील हो गए है। इसलिए अब हार्ड पावर के साथ साथ सॉफ्ट पावर की भूमिका विश्व राजनीति में तेजी के साथ बढ़ने लगी।

6.वैश्वीकरण ने जिस समरूपी समाज के निर्माण को गति दी,उसने विश्व मे विभिन्न समुदायों में पहचान के संकट को भी बढ़ावा दिया। इसने सभ्यता के संघर्ष की स्थिति उतपन्न कर दी है।

7.सुरक्षा की परम्परागत धारणा में परिवर्तन आया है। वर्तमान में वैश्विक आतंकवाद, नृजातीय संघर्ष,प्राकृतिक आपदा जैसे गैर परम्परागत सुरक्षा के खतरे अधिक भयावह है।


2008 के बाद से विश्व राजनीति में आमूलकारी बदलाव आ गया है। इस परिवर्तन को निम्नलिखित रूपों में समझा जा सकता है-

1.2008 में अमेरिका के आर्थिक संकट ने वैश्विक आर्थिक मंदी की स्थिति उतपन्न कर दी।इस आर्थिक मंदी का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव विकसित देशों पर देखा गया। इसके परिणामस्वरूप विकसित देशों द्वारा संरक्षणवादी नीतियों का अनुसरण किया जाने लगा।इस क्रम में अमेरिका द्वारा राष्ट्र प्रथम की नीति के आधार पर बॉय अमेरिकन हॉयर अमेरिकन की नीति को बढ़ावा दिया। इससे अमेरिका की वैश्विक विश्वसनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव उतपन्न हुआ,क्योंकि अमेरिका ही वह देश था जो मुक्त व्यापार का सबसे बड़ा समर्थक था और विकासशील देशों पर संरक्षणवादी नीतियों को समाप्त करने का दवाब बनाता था।

2.अमेरिका की आर्थिक मंदी ने उसे अन्तर्मुखी विदेशनीति का अनुसरण करने के लिए बाध्य किया।अमेरिका वैश्विक स्तर पर अपने आर्थिक और सैन्य बोझ को कम करने का प्रयास करने लगा।जैसे-

  • पेरिस समझौते से स्वयं को अलग करना

  • यूनेस्को,मानवाधिकार परिषद,विश्व स्वास्थ्य संगठन की सदस्यता का त्याग करना

   • इराक,सीरिया,अफगानिस्तान से सैन्य वापसी

इससे अमेरिका के वैश्विक प्रभाव में निरन्तर कमी आने लगी।

3.अमेरिका की अंतर्मुखी विदेशनीति के कारण विश्व मे शक्ति निर्वात की स्थिति उतपन्न हुई,जिसने चीन के वैश्विक प्रभाव विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थिति निर्मित कर दी।चीन की सस्ती विनिर्मित वस्तुओं ने वैश्विक बाजार को नियंत्रित कर लिया।वही चीन की गो ऑउट पालिसी के कारण चीन की कंपनियां अब वैश्विक कंपनियों के रूप में परिवर्तित होने लगी।चीन जल्द ही विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित करने लगा।

4.इसी के साथ वैश्विक शक्ति राजनीति में चीन का आक्रमक उभार होने लगा। चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग द्वारा एशियाई स्वप्न की धारणा दी गयी। जिसमे यह विचार दिया गया कि 21 वी सदी एशियाई सदी है और एशिया एशियाई देशों के लिए है।वस्तुतः चीन की महत्वाकांक्षा बहुध्रुवीय विश्व और एकध्रुवीय एशिया के स्थापना की है।बहुध्रुवीय विश्व की धारणा के तहत चीन ने अन्य उभरती शक्तियों के साथ के साथ ब्रिक्स का गठन किया,जिसका उद्देश्य अमेरिकी नेतृत्व वाले पाश्चात्य विश्व व्यवस्था का विकल्प प्रस्तुत करना था। इसी क्रम में विश्व बैंक के विकल्प में नव विकास बैंक,अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के विकल्प में कॉन्टिनजेन्सी रिजर्व,एशिया विकास बैंक के विकल्प में एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक की धारणा को बढ़ावा दिया।

दूसरी एशिया सहित विश्व मे चीन द्वारा अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया जाने लगा। इस सम्बंध में चीन द्वारा बेल्ट और रोड पहल शुरू किया गया,जिसके माध्यम से उसने हार्टलैंड और रिमलैंड को नियंत्रित करने का प्रयास करने लगा।चीन ने दक्षिणी और पूर्वी चीन सागर तथा हिमालयी क्षेत्र में शक्ति प्रदर्शन के माध्यम से पड़ोसी देशों में असुरक्षा का भाव भी उतपन्न किया,जिससे इन देशों द्वारा चीन की सर्वोच्चता को स्वीकार्यता मिल सके। इसके अतिरिक्त चीन ने चेकबुक डिप्लोमेसी,डिफेंस डिप्लोमेसी,मेडिकल डिप्लोमेसी,कल्चरल डिप्लोमेसी आदि माध्यम से सॉफ्ट पावर के रूप में भी अपने प्रभाव का विस्तार किया।

वैश्विक नीति निर्धारक के रूप में चीन ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भी अपनी भूमिका का विस्तार किया और अधिकांश अंतरराष्ट्रीय संघठनो का मुख्य दानकर्ता बन गया। एशिया में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता के माध्यम से इस क्षेत्र की आर्थिक व्यवस्था को भी नियंत्रित करने का प्रयास किया।

साथ ही चीन अब वैश्विक शांति निर्माता के रूप में भी अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है जैसे सऊदी अरब और ईरान के मध्य मध्यस्थता।


चीन के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और आक्रमकता को प्रतिसन्तुलित करने के लिए अमेरिका द्वारा भी प्रयास किया जा रहा है।इसलिए कुछ विश्लेषकों का यह मानना की है वर्तमान विश्व में पुनः शीत युद्ध की परिस्थितियां निर्मित हो गयी है।


                      शीतयुद्ध 2.0


अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में वैश्विक शक्ति का उत्थान एवं पतन एक स्वाभाविक घटना रही है। इस संदर्भ में समकालीन वैश्विक व्यवस्था भी एक संक्रमण काल ​​में प्रवेश कर चुकी है, जहां वैश्विक शक्ति के दो प्रमुख केंद्र, अमेरिका और चीन, स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। और यह सत्ता की राजनीति के एक नए युग का संकेत देता है।

पहला गुट अमेरिका के नेतृत्व वाला पश्चिमी लोकतांत्रिक ब्लॉक है, जो जी7- नाटो-ईयू त्रयी का प्रतीक है।

दूसरा चीन और रूस के नेतृत्व वाला यूरेशियाई गुट है,जिसमे ईरान और मध्य एशियाई कुछ देश भी शामिल है।

तीसरे गुट में ग्लोबल साउथ के देश शामिल है,जो दोनों गुटों से दूरी बनाए रखना चाहते हैं।


इसलिए कई विश्लेषकों का मानना ​​है कि शीत युद्ध 2.0 पहले से ही आ चुका है, और जब कोई दोनो शीत युद्धों की तुलना करता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यूएस-चीन प्रतिद्वंद्विता यूएस-सोवियत प्रतिद्वंद्विता की तुलना में अधिक गम्भीर होने की संभावना है।


वर्तमान में अमेरिका और चीन की यह प्रतिद्वंतिता को व्यापार युद्ध,सूचना युद्ध,सामरिक युद्ध,तकनीकी युद्ध और वैचारिक युद्ध के रूप में देखा जा सकता है,जैसे-


#अमेरिका और चीन के बीच 1970 के दशक से युद्ध चल रहा है। लेकिन वर्तमान स्थिति में अमेरिका चीन को एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रहा है जो स्थिर, स्वतंत्र और खुली अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है, जबकि चीन की नजर में अमेरिका वर्तमान विश्व की अधिकांश समस्याओं का मूल कारण है।


#वर्तमान में, दोनों देश अपने वैश्विक प्रभुत्व के लिए प्रयास कर रहे हैं। चीन बेल्ट एंड रोड पहल के माध्यम से एशिया के हार्टलैंड और रिमलैंड को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।इसी क्रम में चीन द्वारा वैश्विक विकास पहल, वैश्विक सुरक्षा पहल और वैश्विक सभ्यता पहल के माध्यम से विश्व के अधिकांश देशों की स्वयं पर निर्भरता को बढ़ावा दिया जा रहा है।


जबकि अमेरिका क्वाड,ऑकास,आई2यू2 जैसी पहल के माध्यम से चीन को रणनीतिक रूप से घेरने की कोशिश कर रहा है। 


#मौजूदा दुनिया में चीन और अमेरिका व्यापार और सूचना युद्ध के बीच में हैं। दोनों देश भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्धारण करने के लिए उत्सुक हैं। इसलिए, अमेरिका द्वारा चीन को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से हटाने के प्रयास किए जा रहे हैं। जैसे कि- 

अमेरिका द्वारा चीनी सामानों पर आयात शुल्क में वृद्धि

कोविड के दौरान अमेरिकी कंपनियों का चीन से बाहर निकलना आदि।


दूसरी ओर, चीन अमेरिका के समानांतर अपने सस्ते निर्मित उत्पादों के जरिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला निर्धारित करने की कोशिश कर रहा है। वही चीन क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (आरसीईपी) के माध्यम से आसिया के आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है।


दोनो ही देश चौथी औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व करने के लिए क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और रेयर अर्थ मिनरल पर नियंत्रण का प्रयास कर रहे है।इसी प्रकार ब्लू इकॉनमी को नियंत्रित करने के प्रयास भी किये जा रहे है।


# वर्तमान में अमेरिका विश्व में एक उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों पर आधारित विश्व व्यवस्था का समर्थक हैं। जबकि वह चीन को अंतरराष्ट्रीय कानून, संस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा मानते हैं। वही चीन अमेरिका की पूंजीवादी व्यवस्था का मुखर आलोचक है। वह पूरी दुनिया में अपनी शासन व्यवस्था की मिसाल कायम कर रहा हैं।


#चीन की रणनीतिक घेराबंदी के लिए अमेरिका को भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का समर्थन मिल रहा है। जबकि चीन रूस, ईरान, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया आदि देशों के साथ अपने रणनीतिक गठबंधन को मजबूत कर रहा है।


#दोनों देश अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और संगठनों पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रहे हैं. जैसे- 

चीन द्वारा ब्रेटनवुड्स संस्था के विकल्प के रूप में ब्रिक्स,एससीओ, एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक जैसी पहल करना। 

दूसरी ओर, अमेरिका अपने प्रभुत्व वाले अंतरराष्ट्रीय संगठनों की केंद्रीय भूमिका बनाने की कोशिश कर रहा है।



हालाँकि, वर्तमान अन्योन्याश्रित विश्व में द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था या शीत युद्ध की अवधारणा व्यावहारिक नहीं है। क्योंकि यह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का युग है। जहाँ राष्ट्रों के बीच विरोधाभासी संबंध देखे जा सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में सहयोग है तो कुछ क्षेत्रों में तनाव, इसलिए यह संभावना व्यक्त करना उचित नहीं है कि दुनिया शीत युद्ध के दौर में प्रवेश कर रही है। वर्तमान में शक्ति की राजनीति स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है लेकिन इसके केवल दो केंद्र नहीं हैं। क्योंकि भारत, जापान, ब्राजील आदि मध्य शक्तियाँ विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।


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