विदेशनीति के निर्धारण में शामिल संस्थाएं
वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में विदेशनीति का निर्माण अधिक विशेषज्ञता और व्यवहारिकता की मांग करता है। इसलिए विदेशनीति के निर्माण विभिन्न संस्थाए अपने अपने स्तर पर योगदान दे रही है।
विदेश मंत्रालय
भारत सरकार के कार्य आवंटन के नियम के तहत विदेश मंत्रालय का कार्य वैश्विक मंचों पर राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने और उन्हें प्रोत्साहित करना है। इसके द्वारा अन्य राष्ट्रों के साथ भारत के संबंधों को स्थापित करने के लिए विचार करना,विदेशनीति का निर्माण करना एवं उसका प्रबंधन करने का कार्य किया जाता है। इसलिए विदेश मंत्रालय भारत में विदेश नीति सचिवालय के रूप में कार्य करती है, जो विभिन्न स्रोतों से नीतिगत इनपुट प्राप्त करती है। विदेश मंत्रालय इनका विश्लेषण करती है और नेतृत्व को विभिन्न विकल्प प्रदान करती है।
विदेश नीति में विदेश मंत्रालय के महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद हरीश कपूर का यह मत है कि हाल के वर्षों में विदेश नीति के निर्धारण में विदेश मंत्रालय की भूमिका में गिरावट आयी, जिसके लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी है-
•विदेश नीति के निर्माण में अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों की भागीदारी में वृद्धि हो रही है,जैसे-रक्षा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद,प्रधानमंत्री कार्यालय आदि।
•प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व भी विदेश मंत्रालय के प्रभाव को कम कर रहा है,क्योंकि जब प्रधानमंत्री अधिक ताकतवर होते हैं तो विदेशी मामलों में भी उनकी रुचि अधिक होती है और इसकी वजह से मंत्रालय कमजोर हो जाता है।
• विदेश नीति में के मामलों में सामान्य रुचि की कमी के कारण भी विदेश मंत्रालय का प्रभाव कम हो जाता है। वर्तमान में अन्य मंत्रालयों की भूमिका और उनको लेकर रुचि बढ़ रही है।
मंत्रिमण्डलीय समितियां
मंत्रिमण्डलीय समितियां भारत सरकार की सर्वोच्च नीति निर्धारण संस्था होती है। घरेलू नीतियों के साथ-साथ बाह्य नीतियों के निर्धारण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, विशेष कर सुरक्षा पर गठित मंत्रिमण्डलीय समिति। यह समिति विदेश मंत्रालय के क्रियाकलापों की समीक्षा कर उन्हें आवश्यक नीतिगत निर्देश भी देती है।
प्रधानमंत्री कार्यालय
प्रधानमंत्री कार्यालय प्रधानमंत्री का स्टाफ एजेंसी है,जो प्रधानमंत्री को परामर्श देता है। प्रधानमंत्री कार्यालय घरेलू और विदेश नीति की क्रियान्वयन हेतु विभिन्न मंत्रालयों के मध्य समन्वयन का कार्य करता है। नेहरू जी के शासन से ही प्रधानमंत्री कार्यालय विदेश नीति के निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाता रहा है। उल्लेखनीय की नेहरू जी प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे,हालांकि अन्य सभी प्रधानमंत्री के कार्यकाल में भी प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। वर्तमान सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका केंद्रीय हो गयी है। वर्तमान में प्रधानमंत्री मोदी ही घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार के मुख्य प्रतिनिधि हैं, जिनका प्रभाव संपूर्ण मंत्रिमंडल पर है। वर्तमान में प्रधानमंत्री विदेश नीति के निर्धारण में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। विदेश नीति पर उनका व्यक्तिगत प्रभाव देखा जा सकता है, क्योंकि विश्व के प्रमुख नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध है। प्रधानमंत्री की निरंतर विदेश यात्राएं भी होती रहती हैं और वैश्विक स्तर पर प्रमुख नेता के रूप में उनकी छवि निर्मित हुई है। ऐसे में प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। वर्तमान में विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों में ओवरलैपिंग की प्रवृत्ति दिख रही है, जहां विभिन्न मंत्रालयों में समन्वय स्थापित करने की दृष्टि से प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका बढ़ जाती है, जैसे भारत चीन संबंधों में रक्षा,गृह एवं विदेश मंत्रालय के मध्य समन्वय में प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका केंद्रीय है।
विदेश नीति के निर्धारण में पीएमओ की सकारात्मक और नकारात्मक दोनों भूमिका हो सकती है।
सकारात्मक भूमिका
वर्तमान विश्व में विदेश नीति ही घरेलू नीति का निर्धारण कर रही है, जहां प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय की भूमिका में वृद्धि स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के मध्य समन्वय बनाकर समग्र चिंतन को बढ़ावा दिया जाता है। इससे विदेश नीति के विषयों पर राजनीतिक सहमति बनना आसान हो जाता है।प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा अधिक प्रागमेटिक विदेश नीति निर्माता करना संभव होता है, क्योंकि यह गठबंधन दलों या अन्य मंत्रियों के दबाव से मुक्त होकर कार्य करती है। परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने की दृष्टि से भी प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका अधिक प्रभावी होती है।
नकारात्मक भूमिका
प्रधानमंत्री कार्यालय संविधानेत्तर संस्था के रूप में कार्य करती है,इसलिए इसकी वैधता पर प्रश्न उपस्थित होता है। प्रधानमंत्री कार्यालय की सक्रियता से अन्य मंत्रालयों की भूमिका कमजोर हो जाती है। यह सामूहिक नेतृत्व और सामूहिक जवाबदेहिता की धारणा के विरुद्ध है, क्योंकि विदेश नीति पर व्यापक चर्चा परिचर्चा संभव नहीं हो पाती। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा निर्णय निर्माण प्रक्रिया में स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों की उपेक्षा हो जाती है, जबकि वर्तमान में विदेश नीति में राज्यों की भूमिका में वृद्धि पर बल दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा निर्णय लेने में प्राय जल्दबाजी की जाती है, जो विदेश नीति को अधिक जटिल बना देती है।
संसद
अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची के तहत विदेशी मामलों को संसद के क्षेत्राधिकार में शामिल किया गया है। इसलिए विदेशनीति निर्माण में संसद की भूमिका केंद्रीय होती है। संविधान में संघ सूची के तहत युद्ध और शांति,कूटनीति,संयुक्त राष्ट्र संघ से सम्बंधित मामले,अंतरराष्ट्रीय सन्धियों और समझौते आदि संसद के अधिकार क्षेत्र में आते है।इन विषयों पर संसद आवश्यक विधि निर्माण करती है। वही अनुच्छेद 253 के तहत संसद अंतरराष्ट्रीय सन्धियों और समझौतों को क्रियान्वित करने के लिए राज्य सूची के विषय पर भी विधि निर्माण कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय सन्धियों को अनुमोदित करने की शक्ति भी संसद के पास है,हालांकि संधियों की मूल विषय वस्तु का निर्धारण केंद्र सरकार करती है। सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी होती है, इसलिए संसद द्वारा विदेशी मामलों से संबंधित किसी विषय पर विदेश मंत्री से प्रश्न पूछे जा सकते हैं या स्पष्टीकरण की मांग की जा सकती है।
विदेश नीति के निर्धारण में संसदीय समितियां की सलाहकारी भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इस सम्बंध में संसद में विदेश मंत्रालय की स्थायी समिति और विदेश मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति भारत सरकार इन समितियां की सलाह के आधार पर निर्णय लेती है। इसके अतिरिक्त विदेश नीति के प्रधान में कुछ अन्य समितियां की भी भूमिका होती है जैसे लोक लेखा समिति और प्राक्कलन समिति।
हालांकि संसद की भूमिका कई महत्वपूर्ण कारकों पर निर्भर करती है विशेष कार्यपालिका में शामिल सदस्यों की विशेषज्ञ और प्रभावशाली नेतृत्व की क्षमता पर सांसदों की विदेश नीति में विशेषता और उनके रुचि के स्तर पर देश में आपातकालीन स्थितियों के संदर्भ में और संसद में विभिन्न वर्गों समूहों के प्रतिनिधित्व के स्तर पर हल्के वर्षों में विदेश नीति की के निर्धारण में संसद की भूमिका में वृद्धि हुई है विशेष कर 1990 के बाद जब गठबंधन सरकारों के दौर में एक डाली प्रभुत्व की स्थिति का अंत हुआ दूसरी ओर वर्तमान में नागरिकों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के संबंध में जागरूकता भी बढ़ी है और सांसद भी विदेश नीति के संदर्भ में अधिक सक्रिय दिखाई दे रहे हैं
हालांकि विदेशनीति निर्माण में संसद की भूमिका निम्नलिखित कारणों से सीमित भी हो जाती है-
राजनीतिक दलों की विचारधारा और वैचारिक झुकाव विदेशनीति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारतीय संसदीय व्यवस्था में कार्यपालकीय सर्वोच्चता की स्थिति देखी जाती है,जिसके कारण संसद में बहुमत प्राप्त सरकार ही विदेशनीति से सम्बंधित सभी निर्णय लेती है और संसद की भूमिका सीमित होती जाती है।
विदेशनीति के निर्माण का कार्य अत्यधिक संवेदनशील है,इसलिए विदेशनीति से सबंधित अनेक निर्णय गोपनीय रखे जाते है। इसलिए पर्याप्त सूचना के अभाव में संसद की भूमिका सीमित हो जाती है।
प्रायः सांसदों की विदेशी मामलों में अभिरुचि भी कम होती है,इसलिए विदेशी मामलों से सम्बंधित संसदीय बहस के दौरान सीमित सहभागिता देखी जाती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद
नीतिगत सक्रियता और एजेंसियों के मध्य समन्वय स्थापित करने के लिए एक विशेषज्ञ संस्था की आवश्यकता होती है। इसी संदर्भ में प्रोफेसर के पी मिश्रा और के सुब्रमण्यम द्वारा सर्वप्रथम राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद गठित करने का सुझाव दिया गया था। जे बंदोपाध्याय ने भी अपनी पुस्तक मेकिंग ऑफ इंडियन फॉरेन पॉलिसी में अमेरिकी मॉडल पर आधारित विदेश नीति परिषद के पक्ष में विचार दिया था। इसी पृष्ठभूमि में 1998 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की स्थापना की गई थी।
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष होते हैं, जबकि विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री,गृह मंत्री,वित्त मंत्री तथा नीति आयोग के उपाध्यक्ष इसके सदस्य होते हैं। दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इस परिषद के सचिव होते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ, विदेश सेवा के सेवानिवृत अधिकारी, शिक्षाविद,वरिष्ठ नौकरशाह और सेना प्रमुख जैसे विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद एक त्रिस्तरीय परिषद है,जिसमें रणनीतिक योजना समूह,राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारी बोर्ड तथा संयुक्त आसूचना समिति शामिल है।
रणनीतिक योजना समूह
इसकी अध्यक्षता कैबिनेट सचिव द्वारा की जाती है। इसके सदस्यों में सभी महत्वपूर्ण मंत्रालयों और विभागों के सचिव शामिल होते हैं। साथ ही रॉ और आईबी के प्रमुख, थलसेना अध्यक्ष, नौसेना अध्यक्ष, वायुसेना अध्यक्ष और आरबीआई के गवर्नर आदेश में शामिल होते हैं। यह भारत की रणनीतिक नीतियां निर्मित करने और उसके क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी है। यह भारत हेतु दीर्घकालिक रणनीति तैयार करने का कार्य करता है। साथ ही अंतर मंत्रालय समन्वय का भी कार्य करता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड
इस बोर्ड में सरकार के बाहर के सदस्यों को शामिल किया जाता है, जैसे शिक्षाविद,वैज्ञानिक,प्रशासनिक विशेषज्ञ, सेवानिवृत्ति नौकरशाह आदि। यह राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास से संबंधित मामलों पर सलाह देता है।
संयुक्त आसूचना समिति
यह समिति रॉ,आईबी तथा नौसेना थलसेना,वायुसेना तथा निदेशालियों से आसूचना प्राप्त करती है। यह समिति शीर्षस्थ सूचना आकलन करने वाली समिति है, जिसे आज सूचना के संग्रहण और विश्लेषण की जिम्मेदारी दी गई है। यह विदेशी मामलों और रक्षा से संबंधित मामले ऑन पर निर्णय लेने के लिए प्रधानमंत्री तथा मंत्री परिषद का एक महत्वपूर्ण और प्रभावी परामर्श निकाय है।
राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद भारत सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा विदेश नीति और रक्षा संबंधी मामलों में परामर्श देने वाला शीर्षस्थ निकाय है। विदेश नीति के संबंध में इसकी संबंध में कार्य भूमिका होती है। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के कारण विदेश नीति में न केवल विशेषज्ञता आती है, बल्कि सामरिक संस्कृति का भी विकास होता है। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के इनपुट राजनीतिक नेतृत्व को निर्णय लेने में सहायता करते हैं, जैसे 1998 में भारत के परमाणु सिद्धांत के निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसलिए वर्तमान में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद भारत के सामरिक इंजन के रूप में कार्य कर रहा है।
हालांकि यह एक परामर्शकारी संस्था है और इसकी नियमित बैठकर भी प्रायः नहीं होती है। इसका अपना स्वतंत्र सचिवालय भी नहीं है, बल्कि यह संयुक्त आसूचना के सचिवालय का प्रयोग करती है। इसे संविधिक दर्जा भी नहीं दिया गया है।
रक्षा मंत्रालय
वर्तमान भू सामरिक विश्व में सुरक्षा संबंधी विषय किसी देश के विदेश नीति निर्माण के मुख्य प्रेरक तत्व है इसलिए विदेश नीति के निर्माण में सुरक्षा संबंधी विषयों पर रक्षा मंत्रालय के विचार महत्वपूर्ण होते हैं रक्षा मंत्री सुरक्षा संबंधी मंत्री मंडली समिति और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सदस्य भी होते हैं।
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय
वर्तमान भू और प्रधान विश्व में विदेश नीति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एजेंडा व्यापार वाणिज्य हो गया है ऐसे में वाणिज्य मंत्रालय भारत के आर्थिक कूटनीति के संचालन में केंद्रीय भूमिका निभाती है विश्व व्यापार संगठन के मंच पर तथा द्विपक्षी और बहुप्पक्षीय मुक्त व्यापार समझौते आदि में व्यापार के मुद्दे पर वाणिज्य मंत्रालय ही नीतियां निर्धारित करती है
राजनीतिक दल दबाव समूह और गैर सरकारी संगठन
राजनीतिक दल,दबाव समूह और गैर सरकारी संगठन विदेश नीति को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राजनीतिक दल जनमत की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा सरकार तक महत्वपूर्ण इनपुट पहुंचाते हैं। राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों में विदेश नीति की प्राथमिकता स्पष्ट होती है। साथ ही राजनीतिक दल अन्य देशों में भारतीय डायस्पोरा को आकर्षित करने का भी प्रयास करते हैं।
वही दबाव समूह भी विदेश नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दबाव समूह अंतरराष्ट्रीय संधियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते हैं और इसके आधार पर सरकार के निर्णयों को परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं , जैसे विश्व व्यापार संगठन के मंच पर निर्णय के निर्धारण में दबाव समूह की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
इसी प्रकार गैर सरकारी संगठन भी विदेश नीति को निर्धारित कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर गैर सरकारी संगठनों का नेटवर्क व्यापक रूप में फैला है, इसलिए अधिकांश गैर सरकारी संगठन वैश्विक एजेंडे को निर्धारित करती हैं, विशेषकर पर्यावरण और मानवाधिकार के क्षेत्र में कार्यरत गैर सरकारी संगठन। इनके द्वारा किसी भी देश की छवि को प्रभावित किया जा सकता है। इसलिए सरकारें भी विदेश नीति के निर्धारण में गैर सरकारी संगठनों के पक्ष को शामिल करने का प्रयास करती है।
थिंक टैंक
वर्तमान में विदेश नीति विशेषज्ञता का कार्य हो गया है,जहां विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की भूमिका बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि विदेशनीति के निर्माण में थिंक टैंक की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। थिंक टैंक विदेशी मामलों के संदर्भ में गहन अनुसंधान और विश्लेषण करते हैं। इनके द्वारा सरकार को दिए जाने वाले नीतिगत इनपुट अनुसंधानपरक, तथ्यपरक और दीर्घकालिक आवश्यकताओं पर आधारित होते हैं। थिंक टैंक में अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ और अनुभवी सामरिक चिंतक और शिक्षाविद शामिल होते हैं। अधिकांश सरकारों के विदेश नीति निर्धारण में इनका मार्गदर्शन महत्वपूर्ण रहा है जैसे कि केपीएस मिलन के सुब्रमण्यम जी पर सारथी जयंत दीक्षित आदि। वर्तमान में भारत में अनेक महत्वपूर्ण संस्थाएं थीं टैंक के रूप में कार्य कर रही है जैसे इर्षा ओ आर एफ गेटवे हाउस विवेकानंद प्रतिष्ठान आदि।
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ReplyDeleteWonderful blog Sir , all your blogs are separate questions of UPSC for me but it is very fruitful for others also to know how foreign policy is being framed.
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